No Fit (52)

अक्सर माँ डिब्बे में भरती रहती थी
कंभी मठरियां , मैदे के नमकीन
तले हुए काजू ..और कंभी मूंगफली
तो कभी कंभी बेसन के लड्डू
आहा ..कंभी खट्टे मीठे लेमनचूस

थोड़ी थोड़ी कटोरियों में
जब सारे भाई बहनों को
एक सा मिलता
न कम न ज्यादा
तो अक्सर यही ख्याल आता
माँ ..ना सब नाप कर देती हैं
काश मेरी कटोरी में थोड़ा ज्यादा आता
फिर सवाल कुलबुलाता
माँ होना कितना अच्छा है ना
ऊँचा कद लंबे हाथ
ना किसी से पूछना ना किसी से माँगना
रसोई की अलमारी खोलना कितना है आसान
जब मर्जी खोलो और खा लो

लेकिन रह रह सवाल कौंधता
पर माँ को तो कभी खाते नहीं देखा
ओह शायद
तब खाती होगी जब हम स्कूल चले जाते होगे
या फिर रात में हमारे सोने के बाद
पर ये भी लगता ये डिब्बे तो वैसे ही रहते
कंभी कम नही होते
छुप छुप कर भी देखा
माँ ने डिब्बे जमाये करीने से
बिन खाये मठरी नमकीन या लडडू
ओह्ह
अब समझी शायद माँ को ये सब है नही पसन्द
एक दिन माँ को पूछा माँ तुम्हें लड्डू नही पसन्द
माँ हँसी और बोली
बहुत है पसन्द और खट्टी मीठी लेमनचूस भी
अब माँ बनी पहेली
अब जो सवाल मन मन में था पूछा मैंने
माँ तुमको जब है सब पसन्द
तो क्यों नही खाती
क्या डरती हो पापा से
माँ हँसी पगली
मैं भी खूब खाती थी जब मै बेटी थी
अब माँ हूँ जब तुम खाते हो तब मेरा पेट भरता है
अच्छा छोडो जाओ खेलो
जब तुम बड़ी हो जाओगी सब समझ जाओगी

आज इतने अरसे बाद
बच्चे की पसन्द की चीजें भर रही हूँ
सुन्दर खूबसूरत डिब्बों में
मन हीं मन बचपन याद कर रही
सच कहा था माँ ने
माँ बनकर हीं जानोगी
माँ का धैर्य माँ का प्यार माँ का संयम
सच है माँ की भूख बच्चे संग जुड़ी है
आज मैं माँ हूँ 😊

 
21
 
2 days
 
Jasmine

Change is good & its always welcomed.
But why it hurts and tears apart, when people change....

 
19
 
17 days
 
Jasmine

इंसान जितना ऑनलाइन होता जा रहा है..!
इंसानियत उतनी ही ऑफलाइन होती जा रही है..!

 
98
 
54 days
 
aaakash

न जाने क्यों महसूस नहीं होती वो गरमाहट,
इन ब्राँडेड वूलन गारमेंट्स में ,
जो होती थी
दिन- रात, उलटे -सीधे फन्दों से बुने हुए स्वेटर और शाल में.

आते हैं याद अक्सर
वो जाड़े की छुट्टियों में दोपहर के आँगन के सीन,
पिघलने को रखा नारियल का तेल,
पकने को रखा लाल मिर्ची का अचार.

कुछ मटर छीलती,
कुछ स्वेटर बुनती,
कुछ धूप खाती
और कुछ को कुछ भी काम नहीं,
भाभियाँ, दादियाँ, बुआ, चाचियाँ.

अब आता है समझ,
क्यों हँसा करती थी कुछ भाभियाँ ,
चुभा-चुभा कर सलाइयों की नोक इधर -उधर,
स्वेटर का नाप लेने के बहाने,

याद है धूप के साथ-साथ खटिया
और
भाभियों और चाचियों की अठखेलियाँ.

अब कहाँ हाथ तापने की गर्माहट,
वार्मर जो है.

अब कहाँ एक-एक गरम पानी की बाल्टी का इन्तज़ार,
इन्स्टेंट गीजर जो है.

अब कहाँ खजूर-मूंगफली-गजक का कॉम्बिनेशन,
रम विथ हॉट वॅाटर जो है.

सर्दियाँ तब भी थी
जो बेहद कठिनाइयों से कटती थीं,
सर्दियाँ आज भी हैं,
जो आसानी से गुजर जाती हैं.

फिर भी
वो ही जाड़े बहुत मिस करते हैं,
बहुत याद आते हैं.

 
80
 
56 days
 
Jasmine

पढोगे तो रो पड़ोगे

जीवन के 20 साल हवा की तरह उड़ गए । फिर शुरू हुई नोकरी की खोज । ये नहीं वो, दूर नहीं पास । ऐसा करते करते 2 3 नोकरियाँ छोड़ते एक तय हुई। थोड़ी स्थिरता की शुरुआत हुई।

फिर हाथ आया पहली तनख्वाह का चेक। वह बैंक में जमा हुआ और शुरू हुआ अकाउंट में जमा होने वाले शून्यों का अंतहीन खेल। 2- 3 वर्ष और निकल गए। बैंक में थोड़े और शून्य बढ़ गए। उम्र 25 हो गयी।

और फिर विवाह हो गया। जीवन की राम कहानी शुरू हो गयी। शुरू के एक 2 साल नर्म, गुलाबी, रसीले, सपनीले गुजरे । हाथो में हाथ डालकर घूमना फिरना, रंग बिरंगे सपने। पर ये दिन जल्दी ही उड़ गए।

और फिर बच्चे के आने ही आहट हुई। वर्ष भर में पालना झूलने लगा। अब सारा ध्यान बच्चे पर केन्द्रित हो गया। उठना बैठना खाना पीना लाड दुलार ।

समय कैसे फटाफट निकल गया, पता ही नहीं चला।
इस बीच कब मेरा हाथ उसके हाथ से निकल गया, बाते करना घूमना फिरना कब बंद हो गया दोनों को पता ही न चला।

बच्चा बड़ा होता गया। वो बच्चे में व्यस्त हो गयी, मैं अपने काम में । घर और गाडी की क़िस्त, बच्चे की जिम्मेदारी, शिक्षा और भविष्य की सुविधा और साथ ही बैंक में शुन्य बढाने की चिंता। उसने भी अपने आप काम में पूरी तरह झोंक दिया और मेने भी

इतने में मैं 35 का हो गया। घर, गाडी, बैंक में शुन्य, परिवार सब है फिर भी कुछ कमी है ? पर वो है क्या समझ नहीं आया। उसकी चिड चिड बढती गयी, मैं उदासीन होने लगा।

इस बीच दिन बीतते गए। समय गुजरता गया। बच्चा बड़ा होता गया। उसका खुद का संसार तैयार होता गया। कब 10वि आई और चली गयी पता ही नहीं चला। तब तक दोनों ही चालीस बयालीस के हो गए। बैंक में शुन्य बढ़ता ही गया।

एक नितांत एकांत क्षण में मुझे वो गुजरे दिन याद आये और मौका देख कर उस से कहा " अरे जरा यहाँ आओ, पास बैठो। चलो हाथ में हाथ डालकर कही घूम के आते हैं।"

उसने अजीब नजरो से मुझे देखा और कहा कि "तुम्हे कुछ भी सूझता है यहाँ ढेर सारा काम पड़ा है तुम्हे बातो की सूझ रही है ।"
कमर में पल्लू खोंस वो निकल गयी।

तो फिर आया पैंतालिसवा साल, आँखों पर चश्मा लग गया, बाल काला रंग छोड़ने लगे, दिमाग में कुछ उलझने शुरू हो गयी।

बेटा उधर कॉलेज में था, इधर बैंक में शुन्य बढ़ रहे थे। देखते ही देखते उसका कॉलेज ख़त्म। वह अपने पैरो पे खड़ा हो गया। उसके पंख फूटे और उड़ गया परदेश।

उसके बालो का काला रंग भी उड़ने लगा। कभी कभी दिमाग साथ छोड़ने लगा। उसे चश्मा भी लग गया। मैं खुद बुढा हो गया। वो भी उमरदराज लगने लगी।

दोनों पचपन से साठ की और बढ़ने लगे। बैंक के शून्यों की कोई खबर नहीं। बाहर आने जाने के कार्यक्रम बंद होने लगे।

अब तो गोली दवाइयों के दिन और समय निश्चित होने लगे। बच्चे बड़े होंगे तब हम साथ रहेंगे सोच कर लिया गया घर अब बोझ लगने लगा। बच्चे कब वापिस आयेंगे यही सोचते सोचते बाकी के दिन गुजरने लगे।

एक दिन यूँ ही सोफे पे बेठा ठंडी हवा का आनंद ले रहा था। वो दिया बाती कर रही थी। तभी फोन की घंटी बजी। लपक के फोन उठाया। दूसरी तरफ बेटा था। जिसने कहा कि उसने शादी कर ली और अब परदेश में ही रहेगा।

उसने ये भी कहा कि पिताजी आपके बैंक के शून्यों को किसी वृद्धाश्रम में दे देना। और आप भी वही रह लेना। कुछ और ओपचारिक बाते कह कर बेटे ने फोन रख दिया।

मैं पुन: सोफे पर आकर बेठ गया। उसकी भी दिया बाती ख़त्म होने को आई थी। मैंने उसे आवाज दी "चलो आज फिर हाथो में हाथ लेके बात करते हैं "
वो तुरंत बोली " अभी आई"।

मुझे विश्वास नहीं हुआ। चेहरा ख़ुशी से चमक उठा।आँखे भर आई। आँखों से आंसू गिरने लगे और गाल भीग गए । अचानक आँखों की चमक फीकी पड़ गयी और मैं निस्तेज हो गया। हमेशा के लिए !!

उसने शेष पूजा की और मेरे पास आके बैठ गयी "बोलो क्या बोल रहे थे?"

लेकिन मेने कुछ नहीं कहा। उसने मेरे शरीर को छू कर देखा। शरीर बिलकुल ठंडा पड गया था। मैं उसकी और एकटक देख रहा था।

क्षण भर को वो शून्य हो गयी।
" क्या करू ? "

उसे कुछ समझ में नहीं आया। लेकिन एक दो मिनट में ही वो चेतन्य हो गयी। धीरे से उठी पूजा घर में गयी। एक अगरबत्ती की। इश्वर को प्रणाम किया। और फिर से आके सोफे पे बैठ गयी।

मेरा ठंडा हाथ अपने हाथो में लिया और बोली
"चलो कहाँ घुमने चलना है तुम्हे ? क्या बातें करनी हैं तुम्हे ?" बोलो !!

ऐसा कहते हुए उसकी आँखे भर आई !!......
वो एकटक मुझे देखती रही। आँखों से अश्रु धारा बह निकली। मेरा सर उसके कंधो पर गिर गया। ठंडी हवा का झोंका अब भी चल रहा था।

क्या ये ही जिन्दगी है ? नहीं ??

सब अपना नसीब साथ लेके आते हैं इसलिए कुछ समय अपने लिए भी निकालो । जीवन अपना है तो जीने के तरीके भी अपने रखो। शुरुआत आज से करो। क्यूंकि कल कभी नहीं आएगा! .......

 
93
 
63 days
 
Jasmine

ना जाने
कब खो जाऐं ये पल
ना जाने कि
कब बच्चे बड़े हो जाऐं

मैं झिडकती ही रह जाऊँ
और
वो सब कुछ झिड़क कर
घर से निकल जाऐं

आज झिडकती हूँ कि
रखो सारा सामान
तरतीब से
कल तरसूँ कि
काश आ कर वो
सब कुछ बिखेर जाऐं

ये करो ये ना करो,
आज देती हूँ हिदायत
कल सोचूं
जो करो सो करो
बस ज़ोर से
मेरे गले लग जाओ

फिर
क्यों ना उन्हें आज ही
जी लेने दूँ ज़िंदगी
चाहे घर ही पूरा
क्यों ना उलट पुलट जाए

इसी बहाने
मैं भी जी लूँगी ज़िंदगी
दिल शायद फिर दिल से जीना सीख जाए

मैं भी बन जाऊँ बच्चा अपने बच्चों के साथ
इससे पहले कि वो
बड़े हो जाऐं.....🌱

For all parents......

 
69
 
80 days
 
Jasmine

जब वह मेन्यू कार्ड से कोई डिश पसंद कर रही हो तो उसे पसंद करने दें।घर में हर रोज, हर बार का भोजन बनाने के लिये वह अपना काफी समय सिर्फ इसलिये देती है कि क्या बनाना है, कितना बनाना है और किसके लिये बनाना है।

जब वह बाहर जाने के समय तैयार होने के लिये समय ले रही हो तो लेने दें। उसने अपना समय आपके प्रेस किये कपडो़ं को जगह पर संभाल कर रखने में, आपके बेतरतीब रखे मोजों व रुमालों को सहजने में, दिया है। वह अपने बच्चे को संवारने के लिये भी बहुत मेहनत करती है ताकि वह अडो़स पडो़स के सब बच्चों से अच्छा दिख सके।

🌹🌹🌹🌺🌺🌺👏👏जब वह अपना मनपसंद और हमारी नजर में बेसिरपैर का टीवी सीरियल देखती है तो देखने दें। उसका उस सीरियल में तो ध्यान आधा ही रहता है, बाकी का ध्यान तो दिमाग में चल रही घडी़ पर रहता है, जो उसे भोजन का समय आते ही उसका प्रिय सीरियल अधूरा छोड़ कर रसोईघर की तरफ भेज देती है।

जब वह सुबह का नाश्ता बनाने में समय लगा रही हो तो उसे लगाने दें। क्योंकि वह सबसे बढि़या और कुरकुरे सिंके टोस्ट सबको दे रही है और ज्यादा सिंके व जले टोस्ट खुद के लिये अलग कर रख रही है।

जब वह चाय का कप हाथ में ले कर खिड़की के बाहर शून्य में निहार रही हो तो उसे निहारने दें। ये उसका जीवन है, उसने अपने जीवन के अनमोल व अनगिनत घंटे आपको दिये हैं। अब यदि वह अपने जीवन के कुछ पल स्वयं के लिये लेना चाहती है तो लेने दें।

उसका जीवन दूसरों के लिये भागादौडी़ में ही बीत रहा है। कृपया उसे और ज्यादा तेज भागने के लिये मजबूर न करें।
नारी शक्ति को नमन*🌺🌹🌺🌹🙏🙏

 
76
 
83 days
 
Jasmine

*ख़ुशी मनाने के लिए किसी मुहूर्त की जरुरत नही होती...*
*क्योंकि जो ख़ुशी का पल होता है वह खुद में ही ,*
*मुहूर्त होता है...*😊😊💕

 
129
 
103 days
 
aaakash

*माँ , तेरा ये शब्द अनमोल है*





तेरे नाम पर लगे चंद्र बिंदु का मतलब मैं समझ गया *माँ*








तेरी चंद्र 🌙 सी गोदी में

बिंदु ● सा लेटा हूँ मैं

🙏 🙏 🙏 🙏

 
61
 
106 days
 
25th NOVEMBER

नहलाकर बाल बनाने के बाद माँ माथे पर काजल से एक जो काला टीका बना दिया करती थी,
Z+ सिक्योरिटी भी क्या मुकाबला करेगी उसका.

 
152
 
127 days
 
V!shu
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