Amazing Info (463)

*Advice to seniors.*

A study in United States shows over 51% of old people fall down from climbing stairs. Every year, many Americans are killed by climbing stairs.

*Experts Reminder:*

After 65 years, these 10 actions should be avoided:

1 Do not climb staircase. If must climb, hold on firmly to staircase railings.

2 Do not rapidly twist your head. Warm up your whole body first.

3 Do not bend your body to touch your toe. Warm up your whole body first.

4 Do not stand to wear your pants. Wear your pants while sitting down.

5 Do not sit up when lying face up. Sit up from one side (left hand side, or right hand side) of your body.

6 Do not twist your body before exercise. Warm up whole first.

7 Do not walk backwards. Falling backwards can result in serious injury.

8 Do not bend waist to lift heavy weight. Bend your knees and lift up heavy object while half squatting.

9 Do not get up fast from bed. Wait a few minutes before getting up from bed.

10 Do not over force defecation. Let it come naturally.

Please share with all seniors.

 
13
 
2 days
 
Jasmine

*🌺🥀शयन के नियम🥀🌺*

🌺सूने घर में अकेला नहीं सोना चाहिए। देवमन्दिर और श्मशान में भी नहीं सोना चाहिए। *(मनुस्मृति)*
🌺किसी सोए हुए मनुष्य को अचानक नहीं जगाना चाहिए। *(विष्णुस्मृति)*
🌺विद्यार्थी, नौकर औऱ द्वारपाल, ये ज्यादा देर तक सोए हुए हों तो, इन्हें जगा देना चाहिए। *(चाणक्यनीति)*
🌺स्वस्थ मनुष्य को आयुरक्षा हेतु ब्रह्ममुहुर्त में उठना चाहिए। *(देवीभागवत)*
🌺बिल्कुल अंधेरे कमरे में नहीं सोना चाहिए। *(पद्मपुराण)*
🌺भीगे पैर नहीं सोना चाहिए। सूखे पैर सोने से लक्ष्मी (धन) की प्राप्ति होती है। *(अत्रिस्मृति)*
🌺टूटी खाट पर तथा जूठे मुंह सोना वर्जित है। *(महाभारत)*
🌺नग्न होकर नहीं सोना चाहिए। *(गौतमधर्मसूत्र)*
🌺पूर्व की तरफ सिर करके सोने से विद्या, पश्चिम की ओर सिर करके सोने से प्रबल चिन्ता, उत्तर की ओर सिर करके सोने से हानि व मृत्यु, तथा दक्षिण की तरफ सिर करके सोने से धन व आयु की प्राप्ति होती है। *(आचारमय़ूख)*
🌺दिन में कभी नही सोना चाहिए। परन्तु जेष्ठ मास मे दोपहर के समय एक मुहूर्त (48 मिनट) के लिए सोया जा सकता है। *(जो दिन मे सोता है उसका नसीब फुटा है)*
🌺दिन में तथा सुर्योदय एवं सुर्यास्त के समय सोने वाला रोगी और दरिद्र हो जाता है। *(ब्रह्मवैवर्तपुराण)*
🌺सूर्यास्त के एक प्रहर (लगभग 3 घंटे) के बाद ही शयन करना चाहिए।
🌺बायीं करवट सोना स्वास्थ्य के लिये हितकर हैं।
🌺दक्षिण दिशा (South) में पाँव रखकर कभी नही सोना चाहिए। यम और दुष्टदेवों का निवास रहता है। कान में हवा भरती है। मस्तिष्क में रक्त का संचार कम को जाता है स्मृति- भ्रंश, मौत व असंख्य बीमारियाँ होती है।
🌺ह्रदय पर हाथ रखकर, छत के पाट या बीम के नीचें और पाँव पर पाँव चढ़ाकर निद्रा न लें।
🌺शय्या पर बैठकर खाना-पीना अशुभ है।
🌺सोते सोते पढना नही चाहिए।
🌺ललाट पर तिलक लगाकर सोना अशुभ है। इसलिये सोते वक्त तिलक हटा दें।

जय दुःख भंजन 🌹🌹🌹

 
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3 days
 
akshay parekh

*आइंस्टाइन की लिखी इस चिट्ठी में छुपा है दुनिया की बर्बादी का फ़ॉर्म्युला*

आइंस्टाइन ने अगस्त 1939 में एक चिट्ठी लिखी थी. ये चिट्ठी 11 अक्टूबर, 1939 को अपनी मंजिल पर पहुंची. ये चिट्ठी इतिहास के सबसे अहम दस्तावेजों में से एक है. दुनिया आज जिन न्यूक्लियर हथियारों के ढेर पर बैठी है, उसकी बुनियाद में ये चिट्ठी ही है. दुनिया में आज तक केवल दो जगहों पर परमाणु हमले हुए. जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर. ऐटम बमों के इन हमलों से भी आइंस्टाइन का बहुत करीबी रिश्ता था. ये जो इतिहास है, वो 11 अक्टूबर की इस तारीख के साथ नत्थी है.

अल्बर्ट आइंस्टाइन. विज्ञान का सबसे लोकप्रिय चेहरा. E=mc2. इस छोटे से फॉर्मूले ने दुनिया बदल दी. थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी. विश्व की अब तक की सबसे महानतम खोजों में से एक. इसी के दम पर आइंस्टाइन को अब तक का महानतम वैज्ञानिक मानते हैं. आइंस्टाइन निर्माण में यकीन करते थे. खुद को अमनपसंद, शांतिवादी कहते थे. वो थे भी. 1929 में आइंस्टाइन ने कहा था. अगर युद्ध छिड़ता है, तो वो वॉर सर्विस नहीं करेंगे. ना प्रत्यक्ष, ना अप्रत्यक्ष. उन्होंने कहा था:

भले ही लोग कहें कि युद्ध करने की वजह बहुत महान है, मैं तब भी जंग में शामिल नहीं होऊंगा.

जंग को नापसंद करने वाले आइंस्टाइन को जंग ने ही बदला. दूसरे विश्व युद्ध ने. वो अब भी शांति की वकालत करते थे, पर थोड़े बदल गए थे. उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति फ्रेंकलिन डी. रूजवेल्ट को एक चिट्ठी लिखी थी. आइंस्टाइन ने 2 अगस्त, 1939 को ये चिट्ठी लिखी थी. रूजवेल्ट को ये 11 अक्टूबर को मिली. इसमें उन्होंने रूजवेल्ट को परमाणु बम विकसित करने की सलाह दी थी. उन्होंने रूजवेल्ट को आगाह किया. बताया कि शायद जर्मनी न्यूक्लियर बम विकसित कर रहा है. दिलचस्प तो ये भी है कि आइंस्टाइन खुद भी जर्मनी के ही थे. सोचने की बात है. इतना अमनपसंद इंसान न्यूक्लियर बम बनाने की सलाह दे रहा था!

दूर से ही सही, लेकिन परमाणु बम से हुई बर्बादी के साथ आइंस्टाइन का नाम भी हमेशा-हमेशा के लिए जुड़ गया. उन्हें जिंदगी भर इसका अफसोस रहा. जब अमेरिका ने नागासाकी और हिरोशिमा पर न्यूक्लियर बम गिराया, तो आइंस्टाइन बहुत दुखी हुए थे. उन्होंने एक लेख भी लिखा था.आइंस्टाइन की वो चिट्ठी, जिससे शुरू हुआ विनाशकारी सफर कभी खत्म नहीं हुआ. इस चिट्ठी ने दुनिया में ऐसी न्यूक्लियर दौड़ शुरू की, जो चाहे तो सब हमेशा-हमेशा के लिए बर्बाद कर दे. इसके बाद ही अमेरिका ने प्रॉजेक्ट मैनहटन शुरू किया. 6 अगस्त, 1945 को हिरोशिमा पर जो ऐटम बम गिरा, उसका कोड नाम \'लिटिल बॉय\'था. 9 अगस्त, 1945 को नागासाकी पर \'फैट मैन\' गिराया गया. इन दोनों बमों का सफर आइंस्टाइन के हाथों लिखी चिट्ठी के साथ ही शुरू हुआ था. पढ़िए, आइंस्टाइन की उस चिट्ठी का हिंदी तर्जुमा.

अल्बर्ट आइंस्टाइन
ओल्ड ग्रोव रोड
नासू पॉइंट
पेकोनिक, लॉन्ग आइलैंड
2 अगस्त, 1939

सर,
ई फेरमी और एल सेजलार्ड के कुछ हालिया कामों से मुझे लगने लगा है कि जल्द ही यूरेनियम एक नए और बेहद अहम ऊर्जा स्रोत के तौर पर इस्तेमाल में लाया जाने लगेगा. इस घटनाक्रम की कुछ बातों पर नजर रखे जाने की जरूरत है. अगर जरूरत पड़े, तो इसे लेकर प्रशासनिक स्तर पर तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए. इन्हीं बातों को मद्देनजर रखते हुए कुछ बातों और तथ्यों को आपके ध्यानार्थ पेश करना मुझे अपना फर्ज लग रहा है.

पिछले चार महीनों के दौरान कुछ अहम चीजें हुई हैं. फ्रांस में जोलियट और अमेरिका में फेरमी और सेजलार्ड ने कुछ ऐसी चीजें की हैं, जिससे कुछ नई संभावनाएं पैदा हुई हैं. ऐसा लग रहा है कि बहुत बड़ी मात्रा में यूरेनियम के अंदर न्यूक्लियर चेन रिऐक्शन पैदा करना मुमकिन हो सकता है. इसके द्वारा बहुत बड़ी मात्रा में बिजली पैदा हो सकती है. साथ ही, इस प्रक्रिया से बहुत बड़ी मात्रा में रेडियम जैसे रेडियोऐक्टिव पदार्थ भी निकलेंगे. अब तो ऐसा लग रहा है कि आने वाले भविष्य में, बहुत जल्द ही, ऐसा करना मुमकिन हो जाएगा.

इस नई खोज के कारण बमों का बनना भी संभव हो सकेगा. हालांकि इसके बारे में अभी पुख्ता तौर पर तो नहीं कहा जा सकता है, लेकिन फिर भी ऐसा लग रहा है कि इस नई प्रक्रिया के कारण एक अलग तरह का बेहद शक्तिशाली बम बनाया जा सकेगा. इस तरह का एक इकलौता बम, जिसे नाव पर लादकर बंदरगाह ले जाया जाए और वहां फोड़ दिया जाए, तो पूरे बंदरगाह को ही तबाह कर देगा. इतना ही नहीं, इसका असर आस-पास के इलाकों को भी नष्ट कर देगा. इस तरह के बम बेहद वजनदार होंगे और इन्हें हवाई जहाज या विमानों के माध्यम से एक जगह से दूसरी जगह ले जाना बहुत मुश्किल साबित होगा.

अमेरिका के पास जो कच्चा यूरेनियम (अयस्क) है, वो बहुत खराब गुणवत्ता वाला है. इसकी मात्रा भी बहुत ज्यादा नहीं है. कनाडा और पूर्व चेकोस्लोवाकिया के पास बहुत अच्छी गुणवत्ता का यूरेनियम अयस्क मौजूद है. हालांकि कच्चे यूरेनियम का सबसे अहम स्रोत बेल्जियम कॉन्गो है.

इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए आपको शायद ये बेहतर लगेगा कि अमेरिका के अंदर न्यूक्लियर चेन रिऐक्शन पर काम कर रहे वैज्ञानिकों और प्रशासन/सरकार के बीच एक किस्म का स्थायी संपर्क विकसित किया जाए. ऐसा करने का एक संभावित तरीका ये भी हो सकता है कि आप उन वैज्ञानिकों से संपर्क कायम करने की जिम्मेदारी अपने किसी भरोसेमंद इंसान को सौंप दें. ऐसा कोई शख्स जो अनाधिकारिक तौर पर ये जिम्मेदारी निभा सके. उसके ऊपर ये जिम्मेदारियां होंगी:

1. सरकारी महकमों से संपर्क कायम करना. उन्हें नई गतिविधियों और घटनाक्रमों के बारे में सूचित करना. सरकार क्या कार्रवाई करे, क्या कदम उठाए, इस बारे में सलाह देना. अनुशंसा देना. खासतौर पर ये सुनिश्चित करना कि अमेरिका को यूरेनियम की लगातार और अबाध आपूर्ति मिले.

2. इस संबंध में जो प्रयोग हो रहे हैं, उन्हें गति देना. उनकी रफ्तार बढ़ाना. फिलहाल ये प्रयोग विश्वविद्यालयों की प्रयोगशालाओं के अंदर सीमित हैं. इन प्रयोगों को फंड मुहैया कराना. अपने संपर्क के ऐसे लोगों से फंड का इंतजाम करना, जो कि इस काम के लिए फंडिंग करने को तैयार हों. बड़ी कारोबारी और व्यावसायिक प्रयोगशालाओं, जहां सभी जरूरी चीजें और उपकरण मौजूद हों, उनका सहयोग हासिल करने की भी कोशिश की जानी चाहिए.

मैं जानता हूं कि जर्मनी ने चेकोस्लोवाकिया की खदानों से निकलने वाले यूरेनियम को बेचना बंद कर दिया है. फिलहाल उन खदानों पर जर्मनी का ही कब्जा है. उसने इतनी जल्दी ये फैसला क्यों लिया, इसे शायद इस तरीके से समझा जा सके. जर्मन अंडर-सेक्रेटरी ऑफ स्टेट का बेटा बर्लिन स्थित उस कैसर-विल्हेम इंस्टिट्यूट के साथ जुड़ा हुआ है, जहां अमेरिका द्वारा यूरेनियम पर किए गए कुछ प्रयोगों और कामों को दोहराया जा रहा है.

आपका
अल्बर्ट आइंस्टाइन


अमेरिका ने जापान पर जब बम गिराया, तब तक जर्मनी हथियार डाल चुका था. हिटलर के नेतृत्व में जिस नाजी ऐटमिक बम की आशंका के मद्देनजर आइंस्टाइन ने रूजवेल्ट को चिट्ठी लिखी थी, वो टल चुका था. हिरोशिमा और नागासाकी पर हमले के एक साल तक आइंस्टाइन चुप रहे. उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कोई टिप्पणी नहीं की. न्यू यॉर्क टाइम्स के पहले पेज पर एक छोटा सा लेख था. उसमें एक छोटी सी पंक्ति में आइंस्टाइन की प्रतिक्रिया थी. इसमें जो लिखा था, वो आइंस्टाइन की हताशा के शब्द थे. लेख का शीर्षक था- आइंस्टाइन डिप्लोर्स यूज ऑफ ऐटम बम. तारीख थी, 19 अगस्त 1946. अखबार ने लिखा था:

प्रफेसर अल्बर्ट आइंस्टाइन ने कहा कि अगर राष्ट्रपति रूजवेल्ट जिंदा होते, तो जापान पर परमाणु हमला नहीं होने देते. जापान पर हमला इसलिए किया गया, ताकि रूस के शामिल होने से पहले ही प्रशांत महासागर के मोर्चे पर चल रही लड़ाई खत्म की जा सके.

आइंस्टाइन ने बाद में लिखा:

जापान के खिलाफ परमाणु बम के इस्तेमाल की मैंने हमेशा ही निंदा की. ये गलत था. बहुत गलत.
आइंस्टाइन को अपनी लिखी इस चिट्ठी पर तमाम उम्र मलाल रहा. ऐटम बम के निर्माण में अपनी भूमिका पर उन्हें बहुत तकलीफ थी. नवंबर 1954 में अपनी मौत (18 अप्रैल, 1955) के 5 महीने पहले उन्होंने लिखा:

*मैंने अपनी जिंदगी में ये एक बड़ी गलती की है. जब मैंने राष्ट्रपति रूजवेल्ट को भेजी जाने वाली उस चिट्ठी, जिसमें कि ऐटम बम बनाए जाने की अनुशंसा की गई थी, पर दस्तखत किया, तो वो मेरी गलती थी. उस समय उसके पीछे एक तर्क था. जर्मनी के हाथों परमाणु हथियार विकसित किए जाने का खतरा*

 
31
 
7 days
 
Sam's Son

🌷🍯🌷 😇 🌷🍯🌷

*रसोई में स्वास्थ्य !*

🍌 नमक केवल सेन्धा प्रयोग करें। थायराइड, बी पी, पेट ठीक होगा।

🍎 कुकर स्टील का ही काम में लें। एल्युमिनियम में मिले lead से होने वाले नुकसानों से बचेंगे।
🌽 तेल कोई भी रिफाइंड न खाकर, तिल्ली, सरसों, मूंगफली, नारियल प्रयोग करें। रिफाइंड में बहुत केमिकल होते हैं।
🍒 सोयाबीन बड़ी को 2 घण्टे भिगो कर, मसल कर ज़हरीली झाग निकल कर ही प्रयोग करें।
🥑 रसोई में एग्जास्ट फैन जरूरी है, प्रदूषित हवा बाहर करें।
🍎 काम करते समय स्वयं को अच्छा लगने वाला संगीत चलाएं। खाने में अच्छा प्रभाव आएगा और थकान कम होगी।

🍂 ज्यादा से ज्यादा मीठा नीम/कढ़ी पत्ता खाने की चीजों में डालें, सभी का स्वास्थ्य ठीक करेगा।

🌶 ज्यादा चीजें लोहे की कढ़ाई में ही बनाएं। आयरन की कमी किसी को नहीं होगी।

🍌 भोजन का समय ( Timing ) निश्चित करें, पेट ठीक रहेगा। भोजन के बीच बात न करें, भोजन ज्यादा पोषण देगा।
🧀 नाश्ते में अंकुरित अन्न शामिल करें। पोषक विटामिन, फाइबर मिलेंगें।
🥝 चीनी की जगह गुड़ लें।

🍳 छौंक में राई के साथ कलौंजी का भी प्रयोग करें, फायदे इतने कि लिख ही नहीं सकते।
☕ चाय के समय, आयुर्वेदिक पेय की आदत बनाएं व निरोग रहेंगे।
🛢 डस्ट बिन एक रसोई में एक बाहर रखें, सोने से पहले रसोई का कचरा बाहर के डस्ट बिन में डालें।
🥗 रसोई में घुसते ही नाक में घी या सरसों तेल लगाएं, सर और फेफड़े स्वस्थ रहेंगें।

🥕 करेले, मैथी, मूली याने कड़वी सब्जियां भी खाएँ, रक्त शुद्ध रहेगा।

🍋 पानी ज्यादा ठंडा न पिएं, पाचन व दांत ठीक रहेंगे।

🍊 रसोई में घुसते ही थोड़े ड्राई फ्रूट (काजू की जगह तरबूज के बीज) खायें, एनर्जी बनी रहेगी।
🍐 प्लास्टिक, एल्युमिनियम रसोई से हटाये, केन्सर कारक हैं।

🍉 खाने की ठंडी चीजें कम से कम खाएँ, पेट और दांत को खराब करती हैं।

🍑 तली चीजें छोड़ें, वजन, पेट, एसिडिटी ठीक रहेंगी।

🥕 मैदा, बेसन, छौले, राजमां, उड़द कम खाएँ, गैस की समस्या से बचेंगे।
🥒 अदरक, अजवायन का प्रयोग बढ़ाएं, गैस और शरीर के दर्द कम होंगे।

🍹 पानी का correct TDS प्रयोग करें I
🍫 रात को आधा चम्मच त्रिफला एक कप पानी में डाल कर रखें, सुबह कपड़े से छान कर eye wash cup में डाल कर आंखें धोएं, चश्मा उतर जाएगा। छान कर जो पाउडर बचे उसे फिर एक गिलास पानी में डाल कर रख दें। रात को पी जाएं। पेट साफ होगा, कोई रोग एक साल में नहीं रहेगा।
🍆.सुबह रसोई में चप्पल न पहनें I
🍌 रात का भिगोया आधा चम्मच कच्चा जीरा सुबह खाली पेट चबा कर वही पानी पिएं, एसिडिटी खतम।
🍆 एक्यू प्रेशर वाले पिरामिड प्लेटफार्म पर खड़े होकर खाना बनाने की आदत बना लें तो भी सब बीमारी शरीर से निकल जायेगी।
🍈 चौथाई चम्मच दालचीनी का कुल उपयोग दिन भर में किसी भी रूप में करने पर निरोगता अवश्य होगी।
🍑 सर्दियों में नाखून बराबर जावित्री कभी चूसने से सर्दी के असर से बचाव होगा।
🌶 सर्दी में बाहर जाते समय, 2 चुटकी अजवायन मुहं में रखकर निकलिए, सर्दी से नुकसान नहीं होगा।
🍩 रस निकले नीबू के चौथाई टुकड़े में जरा सी हल्दी, नमक, फिटकरी रखकर दांत मलने से दांतों का कोई भी रोग नहीं रहेगा।
🌯 कभी कभी नमक में, हल्दी में 2 बून्द सरसों का तेल डाल कर दांतों को उंगली से साफ करें, दांतों का कोई रोग टिक ( exist ) नहीं सकता।
🍑 बुखार में 1 लीटर पानी उबाल कर 250 ml कर लें, साधारण ताप पर आ जाने पर रोगी को थोड़ा थोड़ा दें, दवा का काम करेगा।
🍐 सुबह के खाने के साथ घर का जमाया ताजा दही जरूर शामिल करें I
🥝 सूरज डूबने के बाद दही या दही से बनी कोई चीज and cucumber न खाएं ज्यादा उम्र में दमा ( Asthma ) हो सकता है।

🍛 दहीबड़े सिर्फ मूंग की दाल के बनने चहिये, उड़द के नुकसान करते हैं।

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168
 
19 days
 
DDLJ143

*स्नान कब ओर केसे करे घर की समृद्धि बढाना हमारे हाथमे है*
सुबह के स्नान को धर्म शास्त्र में चार उपनाम दिए है।

*1* *मुनि स्नान।*
जो सुबह 4 से 5 के बिच किया जाता है।
.
*2* *देव स्नान।*
जो सुबह 5 से 6 के बिच किया जाता है।
.
*3* *मानव स्नान।*
जो सुबह 6 से 8 के बिच किया जाता है।
.
*4* *राक्षसी स्नान।*
जो सुबह 8 के बाद किया जाता है।

▶मुनि स्नान सर्वोत्तम है।
▶देव स्नान उत्तम है।
▶मानव स्नान समान्य है।
▶राक्षसी स्नान धर्म में निषेध है।
.

किसी भी मानव को 8 बजे के बाद स्नान नही करना चाहिए।
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*मुनि स्नान .......*
👉🏻घर में सुख ,शांति ,समृद्धि, विध्या , बल , आरोग्य , चेतना , प्रदान करता है।
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*देव स्नान ......*
👉🏻 आप के जीवन में यश , किर्ती , धन वैभव,सुख ,शान्ति, संतोष , प्रदान करता है।
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*मानव स्नान.....*
👉🏻काम में सफलता ,भाग्य ,अच्छे कर्मो की सूझ ,परिवार में एकता , मंगल मय , प्रदान करता है।
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*राक्षसी स्नान.....*
👉🏻 दरिद्रता , हानि , कलेश ,धन हानि , परेशानी, प्रदान करता है ।
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किसी भी मनुष्य को 8 के बाद स्नान नही करना चाहिए।
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पुराने जमाने में इसी लिए सभी सूरज निकलने से पहले स्नान करते थे।

*खास कर जो घर की स्त्री होती थी।* चाहे वो स्त्री माँ के रूप में हो,पत्नी के रूप में हो,बेहन के रूप में हो।
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घर के बडे बुजुर्ग यही समझाते सूरज के निकलने से पहले ही स्नान हो जाना चाहिए।
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*ऐसा करने से धन ,वैभव लक्ष्मी, आप के घर में सदैव वास करती है।*
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उस समय...... एक मात्र व्यक्ति की कमाई से पूरा हरा भरा पारिवार पल जाता था , और आज मात्र पारिवार में चार सदस्य भी कमाते है तो भी पूरा नही होता।
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उस की वजह हम खुद ही है । पुराने नियमो को तोड़ कर अपनी सुख सुविधा के लिए नए नियम बनाए है।
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प्रकृति ......का नियम है, जो भी उस के नियमो का पालन नही करता ,उस का दुष्टपरिणाम सब को मिलता है।
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इसलिए अपने जीवन में कुछ नियमो को अपनाये । ओर उन का पालन भी करे।
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आप का भला हो ,आपके अपनों का भला हो।
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मनुष्य अवतार बार बार नही मिलता।
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अपने जीवन को सुखमय बनाये।

जीवन जीने के कुछ जरूरी नियम बनाये।
☝🏼 *याद रखियेगा !* 👇🏽
*संस्कार दिये बिना सुविधायें देना, पतन का कारण है।*
*सुविधाएं अगर आप ने बच्चों को नहीं दिए तो हो सकता है वह थोड़ी देर के लिए रोए।*
*पर संस्कार नहीं दिए तो वे जिंदगी भर रोएंगे।*
ऊपर जाने पर एक सवाल ये भी पूँछा जायेगा कि अपनी अँगुलियों के नाम बताओ ।
जवाब:-
अपने हाथ की छोटी उँगली से शुरू करें :-
(1)जल
(2) पथ्वी
(3)आकाश
(4)वायू
(5) अग्नि
ये वो बातें हैं जो बहुत कम लोगों को मालूम होंगी ।

5 जगह हँसना करोड़ो पाप के बराबर है
1. श्मशान में
2. अर्थी के पीछे
3. शौक में
4. मन्दिर में
5. कथा में

सिर्फ 1 बार भेजो बहुत लोग इन पापो से बचेंगे ।।

अकेले हो?
परमात्मा को याद करो ।

परेशान हो?
ग्रँथ पढ़ो ।

उदास हो?
कथाए पढो ।

टेन्शन मे हो?
भगवत गीता पढो ।

फ्री हो?
अच्छी चीजे फोरवार्ड करो
हे परमात्मा हम पर और समस्त प्राणियो पर कृपा करो......

सूचना
क्या आप जानते हैं ?
हिन्दू ग्रंथ रामायण, गीता, आदि को सुनने,पढ़ने से कैन्सर नहीं होता है बल्कि कैन्सर अगर हो तो वो भी खत्म हो जाता है।

व्रत,उपवास करने से तेज़ बढ़ता है,सर दर्द और बाल गिरने से बचाव होता है ।
आरती----के दौरान ताली बजाने से
दिल मजबूत होता है ।

ये मेसेज असुर भेजने से रोकेगा मगर आप ऐसा नही होने दे और मेसेज सब नम्बरो को भेजे ।

श्रीमद भगवत गीता पुराण और रामायण ।
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''कैन्सर"
एक खतरनाक बीमारी है...
बहुत से लोग इसको खुद दावत देते हैं ...
बहुत मामूली इलाज करके इस
बीमारी से काफी हद तक बचा जा सकता है ...

अक्सर लोग खाना खाने के बाद "पानी" पी लेते है ...
खाना खाने के बाद "पानी" ख़ून में मौजूद "कैन्सर "का अणु बनाने वाले '''सैल्स'''को '''आक्सीजन''' पैदा करता है...

''हिन्दु ग्रंथो मे बताया गया है कि...

खाने से पहले'पानी 'पीना
अमृत"है...

खाने के बीच मे 'पानी ' पीना शरीर की
''पूजा'' है...

खाना खत्म होने से पहले 'पानी'
''पीना औषधि'' है...

खाने के बाद 'पानी' पीना"
बीमारीयो का घर है...

बेहतर है खाना खत्म होने के कुछ देर बाद 'पानी 'पीये...

ये बात उनको भी बतायें जो आपको "जान"से भी ज्यादा प्यारे है...

जय श्री राम

रोज एक सेब
नो डाक्टर ।

रोज पांच बदाम,
नो कैन्सर ।

रोज एक निबु,
नो पेट बढना ।

रोज एक गिलास दूध,
नो बौना (कद का छोटा)।

रोज 12 गिलास पानी,
नो चेहेरे की समस्या ।

रोज चार काजू,
नो भूख ।

रोज मन्दिर जाओ,
नो टेन्शन ।

रोज कथा सुनो
मन को शान्ति मिलेगी ।।


"चेहरे के लिए ताजा पानी"।

"मन के लिए गीता की बाते"।

"सेहत के लिए योग"।

और खुश रहने के लिए परमात्मा को याद किया करो ।

अच्छी बाते फैलाना पुण्य है.किस्मत मे करोड़ो खुशियाँ लिख दी जाती हैं ।
जीवन के अंतिम दिनो मे इन्सान इक इक पुण्य के लिए तरसेगा ।

जब तक ये मेसेज भेजते रहोगे मुझे और आपको इसका पुण्य मिलता रहेगा...

जय श्री राम

 
131
 
24 days
 
akshay parekh

*नहीं रहा वो आदमी, जिसने एक फोन न करके पूरी दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध से बचा लिया*

आपने भी पढ़े होंगे नायकों के किस्से. किसी ने ये किया. किसी ने वो कर दिखाया. ऐसी कहानियां जिन्हें सुनकर जिस्म में अड्रेनलिन की बाढ़ आ जाती होगी. रोमांच और आवेश की हालत में यही हार्मोन निकलता है. आपने कई ऐसे किस्से सुने होंगे. बस ये वाला नहीं सुना होगा शायद. स्तेनिस्लाव पैत्रोव. आज की हमारी इस कहानी का हीरो. जिसने दुनिया को बर्बाद होने से बचाया. बस एक कदम का फासला था. उसके पार तबाही थी. परमाणु युद्ध. उस घड़ी में स्तेनिस्लाव पैत्रोव ने जो किया, वो अद्भुत था. ये कहानी सुनाते हुए हमें बड़ा गर्व हो रहा है. तकलीफ बस इतनी है कि उस शख्स की मौत के बाद ये कहानी आप तक पहुंच रही है.

रेडार स्क्रीन पर चेतावनी चमकी- अमेरिका ने मिसाइल दाग दिया है

26 सितंबर, 1983. शीत युद्ध अपने चरम पर था. मॉस्को के पास का एक सीक्रेट कमांड सेंटर. रूसी सेना का. सामने अर्ली वॉर्निंग रेडार सिस्टम की एक बड़ी सी स्क्रीन थी. रूस पर मिसाइल हमला होने पर ये ही स्क्रीन सबसे पहले सावधान करती. एकाएक उस पर कुछ अक्षर उभरे. 44 साल के लेफ्टिनेंट कर्नल स्तेनिस्लाव पैत्रोव इन-चार्ज थे. ओवरनाइट शिफ्ट कर रहे थे. स्क्रीन पर जो लिखा था, उसे पढ़कर पैत्रोव के हाथ-पैर फूल गए. लगा, शरीर का खून जम गया है. स्क्रीन दिखा रही थी. अमेरिका ने रूस पर एक मिनटमैन मिसाइल छोड़ दिया है. अंतर्महाद्वीपीय बलिस्टिक मिसाइल (ICBM). फिर दूसरे मिसाइल की वॉर्निंग आई. फिर तीसरी, चौथी और पांचवीं वॉर्निंग. पांच मिसाइल दागने की वॉर्निंग थी.

कितना अच्छा हुआ कि उस दिन एक सैनिक ने ड्यूटी नहीं निभाई

एक सैनिक को ऐसी स्थितियों के लिए तपाया जाता है. उठ तो उठ, बैठ तो बैठ. पैत्रोव की ड्यूटी तय थी. अब क्या करना था, ये भी तय था. रिसीवर उठाकर एक नंबर घुमाना था. सीनियर्स को बताना था और फिर क्रेमलिन को फैसला लेना था. म्यूचुअली अश्योर्ड डिस्ट्रक्शन. यानी जब कोई देश परमाणु हमला करे, तो जवाबी न्यूक्लियर अटैक करो. ताकि हम तो खत्म हों ही, हमलावर भी न बचे. दोनों देश पूरी तरह से तबाह हो जाएं. लेकिन पैत्रोव ने अपनी ड्यूटी नहीं निभाई. कुछ था उनके अंदर जो रोक रहा था. कह रहा था, ये नहीं हो सकता. उन्हें लगा, कुछ तो गड़बड़ है. कोई चूक हुई है. अमेरिका यूं रूस पर हमला करने की भूल नहीं करेगा.

पैत्रोव के सामने दो ही रास्ते थे

सैनिकों को इसी \'जी जनाब\' के लिए तैयार किया जाता है. अनुशासन. समर्पण. इन सबका सार है, निर्देशों पर हर हाल में अमल हो. अनसुनी क्या, सवाल की भी जगह नहीं. पैत्रोव के पास सोचने का समय नहीं था. रूस के पास जवाबी हमले के लिए बस 30 मिनट थे. एक-एक सेकेंड कीमती था. दो रास्ते थे.

पहला
हैलो, क्रेमलिन. अमेरिका ने तीसरे विश्व युद्ध की शुरुआत कर दी है. 5 मिसाइल रूस की ओर चले आ रहे हैं.

दूसरा
कमांडर, सोवियत रूस के अर्ली वॉर्निंग सिस्टम में खामी है. ये गलत जानकारी दे रहा है.

अलग थी पैत्रोव की परवरिश, तब ही ऐसा फैसला ले पाए!

स्तेनिस्लाव पैत्रोव की परवरिश थोड़ी अलग थी. सख्त आर्मी ट्रेनिंग से पहले सिविलियन जिंदगी जी थी. अपनी टीम के इकलौते ऑफिसर जिसने आम स्कूलों-कॉलेजों से पढ़ाई की. ये ही काम आया शायद. बस ऑर्डर फॉलो नहीं किया, दिमाग भी लगाया. पैत्रोव ने संभावनाओं को खंगाला. सोचा, अगर अमेरिका हमला करता, तो बस 5 मिसाइल नहीं दागता. सैकड़ों मिसाइलें छोड़ता.
पैत्रोव जैसे IT विशेषज्ञों के अलावा और भी विभाग थे अमेरिका की हरकतों पर नजर रखने के लिए. पैत्रोव ने आनन-फानन में सैटेलाइट रेडार ऑपरेटर्स के एक ग्रुप को फोन मिलाया. उनके पास मिसाइल हमले की कोई जानकारी नहीं थी. लेकिन उनकी बातों का क्या? प्रोटोकॉल तो तय था. फैसला तो कंप्यूटर की वॉर्निंग पर ही होना था. पैत्रोव जुआ खेल रहे थे. 50-50 की स्थिति थी. लेकिन फिर पैत्रोव ने मन पक्का किया. सोवियत सेना के मुख्यालय में फोन घुमा दिया और कहा:
हैलो, अर्ली वॉर्निंग रेडार सिस्टम में खामी आ गई है. सिस्टम में गड़बड़ी है.

34 साल पहले बीबीसी रशियन सर्विस को दिए गए एक इंटरव्यू में पैत्रोव ने कहा था:

जब मैंने पहली बार अलर्ट को देखा, तो अपनी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ. सिस्टम दिखा रहा था कि अमेरिका ने रूस पर मिसाइल छोड़ा है. अब मेरे सामने दो सवाल थे- जो दिख रहा है, क्या वो सही है? या फिर ये कंप्यूटर की गलती से हुआ है? फिर एक बार जोर से सायरन बजा. मेरी आरामकुर्सी मानो गर्म फ्राइंग पैन में तब्दील हो गई थी. मैं इतना नर्वस था कि लगा अपने पैरों पर खड़ा भी नहीं हो सकूंगा.

पैत्रोव ने क्या खूब जुआ खेला

जुआ खराब लत है. लेकिन पैत्रोव ने उस दिन क्या खूब जुआ खेला. 23 मिनट बाद पैत्रोव को महसूस हुआ. हमला नहीं हुआ है. उस घड़ी उस शख्स ने क्या महसूस किया होगा? चूंकि हम कभी उनकी जगह नहीं हो सकते, तो शायद हम ठीक-ठीक कल्पना न कर सकें. लेकिन उस फैसले के असर को महसूस करना आसान है. ऐसा न हुआ होता, तो? पैत्रोव ने फोन कर दिया होता, तो? बाद में इस मामले की जांच हुई. सोवियत उपग्रहों ने गलती की थी. सूरज की जो किरणें बादलों पर चमक रही थीं, उन्हें रॉकेट इंजन समझ लिया था.

अमेरिका और सोवियत के बीच पहले ही बहुत टेंशन पसरा पड़ा था

वो वक्त विस्फोटक था. इस तारीख से तीन हफ्ते पहले सोवियत ने कोरिया के एक यात्री विमान को निशाना बनाया था. विमान में बैठे सभी 269 लोग मारे गए थे. रोनाल्ड रीगन ने सोवियत को \'बुराई का साम्राज्य\' कहा था. यूरी ऐंद्रोपोव सोवियत यूनियन की कम्युनिस्ट पार्टी के जनरल सेक्रटरी थे. उनको पूरा यकीन था कि अमेरिका सोवियत पर न्यूक्लियर हमला करेगा.

फोन नहीं करके पैत्रोव ने तीसरा विश्व युद्ध शुरू होने से रोक लिया
रेडार सिस्टम की चेतावनी पर सोवियत सरकार क्या फैसला लेती, ये लगभग पक्का था. ऐसा होता, तो विश्व युद्ध छिड़ता. सामान्य नहीं, परमाणु युद्ध. विश्व की दो सबसे बड़ी महाशक्तियां एक-दूसरे को मिटाने में लग जातीं. ऐसा होता, तो बाकी देशों को भी खेमा चुनना होता. ऐसा नहीं हुआ, तो बस पैत्रोव के कारण.

हम कभी परमाणु युद्ध की संभावना तक नहीं पहुंचे थे. न तो इस घड़ी के पहले और न इसके बाद. मैं कोई हीरो नहीं हूं. मैंने कोई अद्भुत काम नहीं किया. मैं बस अपना फर्ज पूरा कर रहा था. यही मेरी ड्यूटी थी.

तो उसी दिन शुरू हो गया होता परमाणु युद्ध

पैत्रोव के पास मिसाइल अटैक का स्विच दबाने का अधिकार नहीं था. लेकिन अगर वो अपने सीनियर्स को अलर्ट की जानकारी देते, तो कुछ भी हो सकता था. उस समय के हालात ही कुछ ऐसे थे. रूस को लगता था कि किसी भी पल अमेरिका उस पर हमला कर सकता है. ऐसे में पैत्रोव के सीनियर अधिकारी भी उनकी ही तरह संयम दिखाते, इस बात की संभावना बहुत कम है. पैत्रोव ने सेना के नियम जरूर तोड़े, लेकिन दुनिया को परमाणु युद्ध से बचा लिया. रूस को भी बचा लिया. अमेरिका को भी बचा लिया. यहां रहने वाली करोड़ों की आबादी को बचा लिया. पैत्रोव की जितनी तारीफ की जाए, कम है. लेकिन रूस ने उन्हें कभी वो क्रेडिट नहीं दिया, जिसके वो हकदार थे. पैत्रोव को परेशान किया गया. लॉगबुक में एक एंट्री न करने के लिए सुनाया गया.

बहुत सालों तक छुपी रही कहानी स्तेनिस्लाव पैत्रोव की

सोवियत के टॉप आर्मी अफसरों को शर्मिंदा होना पड़ा था. जाहिर है. उनके रेडार सिस्टम ने इतनी बड़ी चूक की थी. इतिहास बदलने वाली चूक. ये बहुत महंगी पड़ सकती थी. परमाणु बम का असर बॉर्डर देखकर तबाही नहीं मचाता. सोवियत सिस्टम के फेल होने की शर्मिंदगी बहुत बड़ी थी. इसका बोझ पैत्रोव के कंधों पर लादने की कोशिश हुई.

1984 में पैत्रोव को रिटायरमेंट लेना पड़ा. समय से काफी पहले. इसकी जानकारी पब्लिक नहीं हुई. सोवियत के विघटन के काफी बाद 1998 में पैत्रोव और 26 सितंबर का वो मामला दुनिया के सामने आया. उस समय पैत्रोव के सीनियर रहे जनरल यूरी वोंतिस्तेव ने अपनी आत्मकथा में इसका जिक्र किया. 2014 में पैत्रोव पर एक डॉक्यूमेंट्री भी बनी. द मैन हू सेव्ड द वर्ल्ड. उन्हें कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले. संयुक्त राष्ट्र ने भी उन्हें शांति पुरस्कार से नवाजा.
मर चुके हैं पैत्रोव, लेकिन हम हमेशा उनके एहसानमंद रहेंगे
स्तेनिस्लाव पैत्रोव गुजर चुके हैं. उन्होंने कहा था,

मेरे सभी सहकर्मी प्रोफेशनल सैनिक थे. उन्हें आदेश देना और हर कीमत पर आदेश मानना सिखाया गया था. अगर मेरी जगह कोई और उस दिन शिफ्ट में होता, तो उसने यकीनन क्रेमलिन को फोन मिला दिया होता. मैं हीरो नहीं हूं. मैंने जो किया, वही मेरी ड्यूटी थी. ये किस्मत थी कि उस रात मैं शिफ्ट कर रहा था.
18 सितंबर, 2017 को दुनिया ने जाना कि उनकी मौत हो गई है. अभी नहीं. मई में. 19 मई, 2017 को मौत हुई. 7 सितंबर को पैत्रोव का जन्मदिन होता है. कार्ल शूमाकर एक जर्मन फिल्म मेकर हैं. सबसे पहले उन्होंने ही पैत्रोव की कहानी से दुनिया को रूबरू कराया था. उन्होंने पैत्रोव को \'हैपी बर्थडे\' कहने के लिए फोन किया. पैत्रोव के बेटे दिमित्री ने अपने पिता की मौत के बारे में बताया. कार्ल के रास्ते ये खबर दुनिया के पास पहुंची. बहुत देर से पहुंची.

कायदे से तो रूस को सबसे ज्यादा शोक मनाना चाहिए. रूस के हर एक शख्स को पैत्रोव का शुक्रगुजार होना चाहिए. अमेरिका को भी. पैत्रोव की कहानी दुनिया की हर सेना, हर सैनिक के पास पहुंचनी चाहिए. ताकि वो जानें कि मशीन की तरह हर आदेश मानना ही देशभक्ति नहीं. दिमाग का इस्तेमाल करना सबसे ज्यादा जरूरी है. युद्ध में लड़ना ही बहादुरी नहीं. युद्ध को टालना सबसे बड़ी बहादुरी है. पैत्रोव ने जो किया, वो सबके बस की बात नहीं. हम उनके एहसानमंद रहेंगे.

इंसान कंप्यूटर से ज्यादा समझदार होता है. हमारा दिमाग किसी भी मशीन के मुकाबले ज्यादा तेज है. आखिरकार, हम इंसानों ने ही तो मशीनों को बनाया है.
- स्तेनिस्लाव पैत्रोव

 
42
 
27 days
 
Sam's Son

*'मुग़लों के बारे में वो झूठ, जिसे बार-बार दोहराकर आपको रटाया जा रहा है'*

अंग्रेज़ों के साथ लंबे स्वतंत्रता संघर्ष के बाद साल 1947 में इंडिया को आज़ादी मिली. इतने लंबे समय तक संघर्ष चलता रहा शायद इसीलिए हम में ऐतिहासिक ज्ञान की कमी है. और हम पर जितने लोगों ने शासन किया सब को हम कॉलोनिस्ट समझते हैं. \'कॉलोनिस्ट\', यानी वो जो दूसरी जगह जाकर अपनी \'कॉलोनी\' बसाते हैं. ये जगह उनके देश से बहुत दूर होती है.

प्रोफ़ेसर हरबंस मुखिया भारतीय इतिहासकार हैं. वो \'कॉलोनाइज़ेशन\' को कुछ यूं बताते हैं- \'किसी जगह और उस जगह पर रहने वाले लोगों पर शासन करना. शासन ऐसे लोगों का जो उस जगह से बहुत दूर रहते हैं और उनका ऐसी जगह आकर कालॉनियां बसाने का मूल मकसद आर्थिक फ़ायदा पाना होता है.\'

ब्रिटिशर्स इंडिया में कॉलोनिस्ट बनकर रहे. उनका मूल मकसद हमेशा यही रहा कि उनका खुद का आर्थिक फ़ायदा होता रहे. इसके उलट, मुग़ल आए तो इंडिया में शासकों की तरह थे लेकिन यहां वो कॉलोनिस्ट की बजाए खुद इंडियन बनकर रहे. प्रोफ़ेसर हरबंस मुखिया बताते हैं, \'मुग़लों ने इंडिया के साथ अपनी पहचान कुछ इस तरह मिला दी कि वो इंडिया का एक अभिन्न हिस्सा बन गए.\'

मुखिया तो ये भी कहते हैं कि मुग़लों का विदेशी होने का मुद्दा हाल ही में उठना शुरू हुआ है. मुग़ल तो बहुत अच्छी तरह से इंडिया में घुले-मिले हुए थे. वो इंडिया को अपना देश ही मानते थे.

उन्हें विदेशी मानने का कोई कारण भी नहीं था, आखिर अकबर के बाद से सारे इंडिया में ही पैदा हुए थे. यहां तक कि उनमें से बहुतों की माएं राजपूत थीं. और ये उनकी \'भारतीयता\' को पूरा करता है.

लोदी वंश के अंतिम शासक थे इब्राहिम लोदी. इनके शासनकाल के दौरान दौलत खान लोदी लाहौर के गवर्नर थे. दौलत खान इब्राहिम के काम से नाख़ुश थे, जिसके चलते उन्होंने बाबर से कहकर राज्य पर आक्रमण करवाया. साल 1526 में पानीपत के युद्ध में बाबर ने इब्राहिम लोदी को हराकर दिल्ली सल्तनत जीती थी. इस तरह मुग़ल शासन की नींव रखी गई.

ज़्यादातर मुग़लों ने भारतीय शासकों, खासकर राजपूतों से शादी करके समझौते किए. इनकी सेना में राजपूत ऊंची पोस्ट पर रहते थे. अक्सर कच्छवाहा राजपूतों को मुग़ल सेना में सबसे ऊंची पदवी दी जाती थी.

साल 1857 में पहली बार भारतीय सैनिक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ खड़े हुए थे, वो भारतीय स्वतंत्रता की पहली लड़ाई थी. ये लड़ाई सैनिकों ने अपने बूढ़े और कमज़ोर मुग़ल शासक बहादुर शाह ज़फ़र को हिंदुस्तान का राजा मानकर उनके बैनर तले लड़ी थी.

16वीं शताब्दी से लेकर 18वीं शताब्दी तक, मुग़ल साम्राज्य दुनिया का सबसे अमीर और सबसे शक्तिशाली साम्राज्य था. 17वीं शताब्दी में भारत आए फ्रांसीसी यात्री फ्रेंकोइस बर्नियर ने लिखा है, \'हिंदुस्तान में दुनिया के हर चौथाई हिस्से से सोना-चांदी आता है.\'

शेरशाह और मुग़लों ने कई सड़कों, नदी परिवहन, समुद्री मार्गों और बंदरगाहों का विकास किया था. साथ ही देश के अंदर के कई टोल-टैक्स खत्म कर व्यापार को बढ़ावा दिया था. इनके राज में इंडियन हैंडीक्राफ्ट्स को काफ़ी तवज्जो दी गई. सूती कपड़े, मसाले, नील, ऊनी और रेशम के कपड़े और नमक जैसी चीज़ों का काफ़ी सफल निर्यात होता था.

भारतीय व्यापारी अपनी शर्तों पर व्यापार किया करते थे. साथ ही पेमेंट में सिर्फ़ सोने-चांदी की ईंटें लेते थे. थॉमस रो एक अंग्रेज़ी राजनीतिज्ञ थे. मुग़लों के राज में ये अंग्रज़ों को रिप्रज़ेंट करते थे. साल 1615 से लेकर साल 1618 तक मुग़ल शासक जहांगीर के आगरा के दरबार में एंबेसेडर थे. उनका कहना था कि यूरोप ने एशिया को समृद्ध बनाने के लिए अपना खून बहाया है (Europe bleedeth to enrich Asia).
इंडिया में परंपरागत रूप से व्यापार हिंदू व्यापारी वर्ग के हाथों में था. यहां तक कि फ्रांसीसी यात्री फ्रेंकोइस बर्नियर ने लिखा है, \'इंडिया में व्यापार ज़हां हिंदू संभालते थे, वहीं देश की सेना में ऊंचे पोस्ट पर मुसलमान बैठे थे.\'

अकबर ने एक बहुत कुशल प्रशासन बनाया हुआ था, जो व्यापार को बढ़ाने में उसकी खूब मदद करता था. ये व्यापार ही तो था जिसमें ईस्ट इंडिया कंपनी को इतना इंटरेस्ट था. पहले इन्होंने व्यापारिक रियायतें देने के नाम पर हस्तक्षेप किया और फिर मुग़ल शासन पर कब्ज़ा कर उसे नष्ट कर दिया.

ब्रिटिश लाइब्रेरी में पेंटर स्पीरिडियोन रोमा की एक बहुत इंटरेस्टिंग पेंटिंग रखी है. इसका नाम है The East Offering Her Riches to Britannia. ये साल 1778 के पेंटिंग है. ब्रिटानिया शब्द को यूनाइटेड किंगडम की फ़ीमेल अवतार के लिए इस्तेमाल किया जाता है. जैसे हम \'भारत माता\' करते हैं.

इस पेंटिंग में इंडिया को भी फ़ीमेल अवतार में दिखाया है. इंडिया घुटनों पर बैठकर अपना ताज और उसके साथ कुछ हीरे-जवाहरात ब्रिटानिया को ऑफ़र कर रही है. असल में इंडिया की दौलत दिल्ली सल्तनत या मुग़लों ने नहीं लूटी थी बल्कि इसे लूटना तो ईस्ट इंडिया कंपनी ने शुरू किया था.

एडमंड बर्क आयरलैंड में जन्मे एक आयरिश राजनेता थे, साथ ही एक लेखक, वक्ता और फ़िलॉसफ़र भी. बाद में वो लंदन चले गए थे और वहां कई सालों तक हाउस ऑफ कॉमन्स में संसद के सदस्य के रूप में सेवा की. वो 1780 के दशक में ऐसा कहने वाले पहले शख्स थे, \'इंडिया जड़ से पूरी तरह बर्बाद हो चुका है. ऐसा ईस्ट इंडिया कंपनी के कारण हुआ जो इस देश की दौलत बहाए जा रही है.\'

ब्रिटिश कॉलोनी बनने से पहले इंडिया की आर्थिक स्थिती कैसी थी.
कैम्ब्रिज के इतिहासकार एंगस मैडिसन ने अपनी किताब Contours of the World Economy 1-2030 AD: Essays in Macro-economic History में लिखा है कि साल 1000 से 1500 के बीच इंडिया की आर्थिक स्थिती सबसे मज़बूत थी. तब इंडिया पर मुग़ल शासन कर रहे थे. 18वीं शताब्दी तक इंडिया चीन को पछाड़ते हुए दुनिया में सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका था.

2016 में इंडिया की GDP 7.2% थी. वहीं 1952 में इंडिया की GDP 3.8% की.

जब ये बात समझ में आ चुकी है कि मुग़लों ने हमारी दौलत नहीं लूटी थी, तो अब बात करते हैं उन बड़े-बड़े स्मारकों की जो इन्होंने बनाए. इन स्मारकों की वजह से हमें हर साल करोड़ों रुपए मिलते हैं.

लोकसभा में कल्चरल मिनिस्ट्री ने जो आंकड़े दिखाए थे, उसके मुताबिक ताजमहल के औसतन हर साल 21 करोड़ रुपए के टिकट बिकते हैं. (साल 2016 में ताजमहल के दर्शकों में गिरावट आई और आंकड़े 17.8 करोड़ रुपये पहुंच गए थे.) ऐसे ही कुतुब मिनार से 10 करोड़ रुपए और लाल किला और हुमायूं के मकबरे से लगभग 6 करोड़ रुपये मिलते हैं.

*बेहतर है कि हम इतिहास को किताबों में पढ़ें, जहां हमेशा सही फैक्ट्स मिलते हैं. न की वॉट्सएप के मैसेजस में जहां अक्सर गलत जानकारियां घूम रही होती हैं*

 
29
 
28 days
 
Sam's Son

क्या आप जानते हैं कि भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना का सलाम अलग क्यों है ?

भारतीय सेनीकों के बीच सलामी एक सम्मान और विश्वास का संकेत है, साथ ही चमकती वर्दी उनकी गोर्वपुर्ण देश की सेवा, शिष्टचार और शिष्टता को प्रदर्शीत करता है. दिलचस्प बात यह है कि सेना के विभिन्न शाखाओं में सलामी अलग-अलग होती हैं. भारत में थलसेना, वायुसेना और नौसेना में अलग-अलग सलामी होते है और उनमें से हर एक का अलग अर्थ और कारण है।

*भारतीय सेना*- खुली हथेली से सामने की तरफ सामना करती है :- भारतीय सेना में, सलामी हथियार के साथ एक खुली हथेली इशारे से दिया जाता है सलामी देने के वक्त सभी उंगलियां और अंगूठे टोपी की सजावटी पट्टी ओर भौंह को स्पर्श करता है.यह न केवल सनीकों के बीच विश्वास स्थापित करता है , बल्की यह भी साबित होता है कि व्यक्ति को सलामी देने के वक्त मन में कोई बुरा इरादा नहीं है और कहीं कोई हथियार भी छिपा हुआ नहीं है.

*भारतीय नौसेना* - खुली हथेलीयों से जमीन की तरफ सामना करती है :- भारतीय नौसेना में, हथेली माथे स्पर्श कर 90 डिग्री के कोण पर जमीन का सामना कर सलामी दिया जाता हैं असल में, इसके पीछे कारण यह है भारतीय नौसेना हमेशा जहाज पर काम करने कि वज़ह से तेल या तेल दाग के कारण हाथ गंदे हो जाते हैं ऐसे में हाथों को छिपाने के लिए खुली हथेलीयों से जमीन की तरफ सलामी देतें है.

*भारतीय वायु सेना* - खुली हथेली से 45 डिग्री के कोण कर जमीन की तरफ सामना करती है :- मार्च 2006 में, भारतीय वायु सेना अपने कर्मियों को सलामी के लिए नए मानदंडों को जारी किए हैं.इस नई सलामी में हथेली को भूमि कि तरफ 45 डिग्री के कोण बनाकर देने की मानदंडों में शामिल किया गया है |

 
77
 
35 days
 
DelhiDude

⛄ *दही में नमक डाल कर न खाऐं* ⛄

कभी भी आप दही को नमक के साथ मत खाईये. दही को अगर खाना ही है, तो हमेशा दही को मीठी चीज़ों के साथ खाना चाहिए, जैसे कि चीनी के साथ, गुड के साथ, बूरे के साथ आदि.

इस क्रिया को और बेहतर से समझने के लिए आपको बाज़ार जाकर किसी भी साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट की दूकान पर जाना है, और वहां से आपको एक लेंस खरीदना है. अब अगर आप दही में इस लेंस से देखेंगे तो आपको छोटे-छोटे हजारों बैक्टीरिया नज़र आएंगे. ये बैक्टीरिया जीवित अवस्था में आपको इधर-उधर चलते फिरते नजर आएंगे. ये बैक्टीरिया जीवित अवस्था में ही हमारे शरीर में जाने चाहिए, क्योंकि जब हम दही खाते हैं तो हमारे अंदर एंजाइम प्रोसेस अच्छे से चलता है.

*हम दही केवल बैक्टीरिया के लिए खाते हैं.* दही को आयुर्वेद की भाषा में जीवाणुओं का घर माना जाता है. अगर एक कप दही में आप जीवाणुओं की गिनती करेंगे तो करोड़ों जीवाणु नजर आएंगे. अगर आप मीठा दही खायेंगे तो ये बैक्टीरिया आपके लिए काफ़ी फायेदेमंद साबित होंगे. *वहीं अगर आप दही में एक चुटकी नमक भी मिला लें तो एक मिनट में सारे बैक्टीरिया मर जायेंगे* और उनकी लाश ही हमारे अंदर जाएगी जो कि किसी काम नहीं आएगी. अगर आप 100 किलो दही में एक चुटकी नामक डालेंगे तो दही के सारे बैक्टीरियल गुण खत्म हो जायेंगे. क्योंकि नमक में जो केमिकल्स है वह जीवाणुओं के दुश्मन है.

आयुर्वेद में कहा गया है कि दही में ऐसी चीज़ मिलाएं, जो कि जीवाणुओं को बढाये ना कि उन्हें मारे या खत्म करे | दही को गुड़ के साथ खाईये. गुड़ डालते ही जीवाणुओं की संख्या मल्टीप्लाई हो जाती है और वह एक करोड़ से दो करोड़ हो जाते हैं. थोड़ी देर गुड मिला कर रख दीजिए. बूरा डालकर भी दही में जीवाणुओं की ग्रोथ कई गुना ज्यादा हो जाती है. मिश्री को अगर दही में डाला जाये तो ये सोने पर सुहागे का काम करेगी. भगवान कृष्ण भी दही को मिश्री के साथ ही खाते थे. पुराने समय के लोग अक्सर दही में गुड़ डाल कर दिया करते थे.

 
240
 
48 days
 
DDLJ143

*हज में कटने वाले लाखों जानवर आते कहां से हैं और चले कहां जाते हैं?*

\'हज\' मुसलमानों की जिंदगी का एक ज़रूरी काम. इस्लाम के पांच सिद्धांतों में से एक. हज यात्रा हर मुसलमान को अपनी जिंदगी में एक बार करनी ज़रूरी है अगर वो ऐसा करने में समर्थ है तो. हज \'काबा\' का तवाफ़ (परिक्रमा) करके होता है. जोकि सऊदी अरब के शहर मक्का में है. दुनियाभर के लाखों मुसलमान हर साल वहां पहुंचते हैं. \'हज\' कम्पलीट करने में पांच दिन लगते हैं. जिस दौरान कई रस्में पूरी करनी होती हैं. इन्हीं में से एक होती है कुर्बानी की रस्म.

हज तभी पूरा होता है. जब वहां मुसलमान पूरी इबादत करने के बाद किसी जानवर की कुर्बानी दे देते हैं. और ऐसा हर हाजी को करना होता है. जिन जानवरों की कुर्बानी की जाती है, उनमें बकरा, भेड़ और ऊंट शामिल होते हैं. जिस दिन ये कुर्बानी वहां होती है वो दिन ईद-उल-अज़हा यानी बकरीद होती है. साल 2016 में हाजियों की संख्या 15 लाख थी. यानी 15 लाख जानवर काटे गए.

सऊदी अरब के हज और उमरा मामलों के निदेशक अब्देलमजीद मोहम्मद अल-अफगानी ने मीडिया को बताया है कि इस साल 20 लाख हाजियों के यहां पहुंचने की उम्मीद है. अगर ऐसा होता है तो फिर 20 लाख जानवरों की कुर्बानी होगी.

20 लाख जानवर. बहुत बड़ा आंकड़ा होता है. अगर इतने जानवर कटेंगे तो उनका मीट कितना होगा? सवाल मन में आता है कि इतने जानवर कटने के बाद कहां चले जाते हैं. क्या होता है इतने मीट का? और जहां कटते हैं वहां तो खून ही खून नज़र आता होगा?

शरीयत के मुताबिक जिस जानवर की कुर्बानी की जाती है उसके तीन हिस्सों में दो हिस्से मीट गरीबों में बांटना होता है. और एक हिस्सा कुर्बानी करने वाला खुद खा सकते हैं. लेकिन जो हज करने गया है न वो एक हिस्सा मीट खुद खा सकता है और न ही वहां मौजूद गरीब लोग इतना ढेर सारा मीट एक साथ कटने पर खा सकते हैं.

ऐसे में जब तक कोई ख़ास व्यवस्था नही थी तो बहुत सारा मीट पड़ा रह जाता था. दशकों पहले इन जानवरों को जमीन में दफ़न कर दिया जाता था. क्योंकि ज्यादा वक़्त तक उसको गर्मी की वजह से रखा भी नहीं जा सकता था. हज के दौरान वहां तापमान करीब 40 से भी ऊपर होता है. लेकिन अब इस मीट को ठिकाने लगाने के इंतजाम कर लिए गए हैं. साथ ही वो तरीके भी जिससे वहां गंदगी न फैले. ख़ून ही खून न दिखाई दे. सऊदी अरब सरकार कुर्बानी के मीट को उन देशों में भेज देती है, जहां पर गरीब मुस्लिम रहते हैं. साल 2013 में सऊदी अरब ने जो मीट बाहर भेजा, उनमें सबसे ज्यादा हिस्सा सीरिया को भेजा गया. कुर्बानी के बाद 9 लाख 93 हज़ार जानवर साल 2012 में 24 देशों में भेजे गए थे. साल 2013 में 28 देशों में मीट भेजा गया. इन देशों में सोमालिया. इंडोनेशिया, सीरिया, जैसे देश शामिल होते हैं. \'यूटिलाइजेशन ऑफ़ हज मीट\' प्रोजेक्ट सऊदी सरकार ने 36 साल पहले लॉन्च किया था. जिसके तहत इस मीट को बांटने का काम किया जाता है.

इस तरह होती है अब कुर्बानी

सऊदी अरब में अब कुर्बानी करवाने के लिए इस्लामिक डेवलपमेंट बैंक है. जहां से मुसलमान कुर्बानी का कूपन लेकर कुर्बानी करा सकते हैं. या फिर वो खुद भी वहीं से जानवर खरीदकर कुर्बानी करा सकते हैं. मक्का के पास ही एक बूचड़खाना है जो पोस्ट ऑफिस के ज़रिए हज पर आने वाले मुसलमानों के लिए कुर्बानी का इंतजाम करता है. ये इस्लामिक डेवलपमेंट बैंक से जुड़ा है. बस यहां मुसलमानों को अपने नाम से कुर्बानी के पैसे जमा कराने होते हैं. ये पैसे जानवर के हिसाब से जमा कराने होते हैं. जैसे ऊंट की कुर्बानी देनी है या फिर बकरे-भेड़ की. इनकी कीमत तय होती है. यहां पैसे देकर हाजियों को कुर्बानी के लिए परेशान होने की ज़रूरत नहीं. क्योंकि सऊदी सरकार खुद ही कुर्बानी का इंतजाम करा देती है. अलग अलग बने स्लॉटर हाउस में कुर्बानी करा दी जाती है. जब कुर्बानी हो जाती है तो एक टेक्स्ट मैसेज से उस हाजी को खबर दे दी जाती है कि आपके नाम की कुर्बानी हो गई है. इससे गंदगी भी नहीं होती और व्यवस्था भी बनी रहती है.

कहां से आते हैं इतने जानवर?

लाखों की तादाद में कटने वाले जानवर आखिर मक्का में आते कहां से होंगे, जो हर साल काट दिए जाते हैं. सऊदी अरब में ये जानवर इम्पोर्ट किए जाते हैं. सबसे ज्यादा बकरे ईस्ट अफ्रीका के सोमालीलैंड से आते हैं. इनकी तादाद करीब एक मिलियन होती है. शिप पर लादकर जानवर सऊदी अरब पहुंचाए जाते हैं. यहां ज्यादतर लोग पशुपालन में लगे हैं. सोमालीलैंड का अब सूडान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से कम्पटीशन है. हालांकि ये जानवर उरुग्वे, पाकिस्तान, तुर्की और सोमालिया से भी सऊदी अरब पहुंचते हैं.

 
73
 
49 days
 
Sam's Son
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