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ये हैं वो आठ योगी महापुरुष जो आज भी जीवित और अमर माने जाते हैं..

1. भगवान हनुमान - अंजनी पुत्र हनुमान जी को अजर और अमर रहने के वरदान मिला है तथा इन की मौजूदगी रामायण और महाभारत दोनों जगह पर पाई गई है.रामायण में हनुमान जी ने प्रभु राम की सीता माता को रावण के कैद से छुड़वाने में मदद की थी और महाभारत में उन्होंने भीम के घमंड को तोडा था. सीता माता ने हनुमान को अशोक वाटिका में राम का संदेश सुनाने पर वरदान दिया था की वे सदेव अजर-अमर रहेंगे. अजर-अमर का अर्थ है की उनकी कभी मृत्यु नही होगी और नही वे कभी बूढ़े होंगे. माना जाता है की हनुमान जी इस धरती पर आज भी विचरण करते है.

2. अश्वत्थामा - अश्वत्थामा गुरु द्रोणाचर्य के पुत्र है तथा उनके मष्तक में अमरमणि विध्यमान है. अश्वत्थामा ने सोते हुए पांडवो के पुत्रो की हत्या करी थी जिस कारण भगवान कृष्ण ने उन्हें कालांतर तक अपने पापो के प्रायश्चित के लिए इस धरती में ही भटकने का श्राप दिया था. हरियाणा के करुक्षेत्र और अन्य तीर्थ में उनके दिखाई दिए जाने के दावे किये जाते है तथा मध्यप्रदेश के बुराहनपुर में उनके दिखाई दिए जाने की घटना प्रचलित है.

3. ऋषि मार्कण्डेय - ऋषि मार्कण्डेय भगवान शिव के परम भक्त है. उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपश्या द्वारा महामृत्युंजय तप को सिद्ध कर मृत्यु पर विजयी पा ली और चिरंजीवी हो गए.

4. भगवान परशुराम -परशुराम भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जाते है. परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि और माता का नाम रेणुका था. परशुराम का पहले नाम राम था परन्तु इस शिव के परम भक्त थे. उनकी कठोर तपश्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें एक फरसा दिया जिस कारण उनका नाम परशुराम पड़ा.

5. कृपाचार्य -कृपाचार्य शरद्वान गौतम के पुत्र है. वन में शिकार खेलते हुए शांतून को दो शिशु मिले जिनका नाम उन्होंने कृपि और कृप रखा तथा उनका पालन पोषण किया. कृपाचार्य कौरवो के कुलगुरु तथा अश्वत्थामा के मामा है. उन्होंने महाभारत के युद्ध में कौरवो को साथ दिया.

6. विभीषण - विभीषण ने भगवान राम की महिमा जान कर युद्ध में अपने भाई रावण का साथ छोड़ प्रभु राम का साथ दिया. राम ने विभीषण को अजर-अमर रहने का वरदान दिया था.

7. वेद व्यास - ऋषि व्यास ने महाभारत जैसे प्रसिद्ध काव्य की रचना करी है. उनके द्वारा समस्त वेदो एवं पुराणो की रचना हुई. वेद व्यास, ऋषि पाराशर और सत्यवती के पुत्र है. ऋषि वेदव्यास भी अष्टचिरंजीवियो में सम्लित है.

8. राजा बलि - राजा बलि को महादानी के रूप में जाना जाता है. उन्होंने भगवान विष्णु के वामन अवतार को अपना सब कुछ दान कर दिया अतः भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल का राजा बनाया और अमरता का वरदान दिया. राजा बलि प्रह्लाद के वंशज है l


#शिवाराधना से दैत्यगुरु शुक्राचार्य को संजीवनी विद्या की प्राप्ति

एक बार दैत्यों के आचार्य शुक्र को अपने शिष्यों दानवों का पराभव देखकर बहुत दुख हुआ और उन्होंने तपस्यों बल से देवों को हराने की प्रतिज्ञा की तथा वे अर्बुद पर्वत पर तपस्या करने चले गए। वहां उन्होंने भूमि के भीतर एक सुरंग में प्रवेश कर \'शुक्रेश्वर\' नामक शिव लिंग की स्थापना की और प्रतिदिन श्रद्धाभक्तिपूर्वक षोडशोपचार से भगवान शंकर की अर्चना करने लगे। अनाहार और अनन्यमनस्क होकर वे परम दारुण तप करने लगे । इस प्रकार तप करते- करते जब उनके एक सहस्त्र बीत गए, तब श्रीमहादेव ने उन्हें दर्शन देकर कहा- हे द्विजोत्तम! मैं तुम्हारी आराधना से परम संतुष्ट हूं, जो वर मांगना चाहो, मांगो शुक्राचार्य ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की-
यदि तुष्टो महादेव विद्यां देहि महेश्वर।
यया जीवंति संप्रासा मृत्युं संख्येऽपि जन्तव:।।
स्कंदपुरायण, प्रभासखंड, अर्बुदखंड
\'हे महेश्वर महादेव, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे वह विद्या दीजिए जिससे युद्ध में भी मरे हुए प्राणी जीवित हो जाएं\',
भगवान शंकर ने प्रसन्नपूर्वक मृत्यु पर विजय प्राप्त कराने वाली तथा मृत प्राणी को भी जीवित कर लेने की शक्ति वाली संजीवनी -विद्या वर के रूप में उन्हें प्रदान की और कहा कि तुम्हें और कुछ मांगना हो तो वह भी मांग लो। तब उन्होंने कहा कि \'महाराज! कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को जो इन शुक्रेश्वर का भक्ति पूर्वक अर्चन करे, उसे अल्पमृत्यु का कभी भय न हो।\' महादेव जी ने तथास्तु कहकर कैलास की ओर प्रयाण किया । वर के प्रभाव से शुक्राचार्य युद्ध में मरे हुए असंख्य दैत्यों को फिर से जिला लेते थे, जिससे दैत्यों को पराजित करना देवों के लिए कठिन हो गया।
इस शुक्रतीर्थ में पितरों की श्राद्धदि क्रिया करने से पितृगण संतुष्ट होते हैं। यहां स्नान करने से एवं शुक्रेश्वर के अर्चन से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है और उसे अल्पमृत्यु का भय कभी नहीं होता, सुख मिलते हैं और वह अंत में शिवलोक को प्राप्त कर शिवगणों के साथ आनंद भोगता है ।

 
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DelhiDude

क्या आप जानते हैं?* 👉 खड़े खड़े पानी पीने वाले का घुटना दुनिया का कोई डॉक्टर ठीक नहीँ कर सकता। 👉* तेज पंखे के नीचे या A. C. में सोने से मोटापा बढ़ता है। 👉* 70% दर्द में एक ग्लास गर्म पानी किसी भी पेन किलर से भी तेज काम करता है। 👉* कुकर में दाल गलती है, पकती नहीँ। इसीलिए गैस और एसिडिटी करती है। 👉* अल्युमिनम के बर्तनों के प्रयोग से अंग्रेजों नें देशभक्त भारतीय क़ैदियों को रोगी बनाया था। 👉* शर्बत और नारियल पानी सुबह ग्यारह के पहले अमृत है। 👉* लकवा होते ही मरीज के नाक में देशी गाय का घी डालने से लकवा पन्द्रह मिनट मेँ ठीक हो जाता है। 👉* देशी गाय के शरीर पर हाथ फेरने से 10 दिन में ब्लड प्रेसर नॉर्मल हो जाता है। अच्छी बातें , अच्छे लोगों, अपने मित्र , रिश्तेदार और ग्रुप मे अवश्य शेयर करे. 🙏😊

 
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anil Manawat

जम्मू-कश्मीर का इतिहास -

1. 1846 में ये स्टेट अस्तित्व में आया. उसके पहले जम्मू का एरिया सिख साम्राज्य का हिस्सा था. महाराजा रणजीत सिंह की सिख सेना के सिपाही गुलाब सिंह को 1822 में जम्मू का राजा बनाया गया. कश्मीर घाटी के लिए अलग गवर्नर था. गुलाब सिंह ने उनसे लड़ाई की. 1821 में गुलाब सिंह ने राजौरी और किश्तवाड़ पर कब्ज़ा कर लिया. 1835 में सुरु और कारगिल. 1834-40 में लद्दाख. 1840 में बालटिस्तान पर कब्ज़ा कर लिया।

2. 1846 में अंग्रेज और सिखों के बीच पहली लड़ाई हुई. उसके पहले तक रणजीत सिंह की चतुराई से लड़ाई होती नहीं थी. गुलाब सिंह अंग्रेजों के साथ मिल गए. सिख हार गए. गुलाब सिंह को स्वतंत्र महाराजा बना दिया गया. फिर कुछ दिन के बाद इनाम में गुलाब को कश्मीर भी मिल गया. उसके बाद गुलाब सिंह जम्मू-कश्मीर दोनों का महाराजा बन गया. और उसके वंश को डोगरा वंश कहा गया. जम्मू कश्मीर की भाषा को आज भी डोगरी कहा जाता है।

3. 1856 में गुलाब के बेटे रणबीर सिंह राजा बने. उसने 1857 की लड़ाई में अंग्रेजों का ही साथ दिया. फिर उसने 1857 में गिलगिट को भी अपने राज में मिला लिया।

4. उसके बाद प्रताप सिंह राजा बना 1885-1925 तक. फिर 1925 से महाराजा हरि सिंह राजा बने जो 1952 तक रहे। किंतु वे 26 अक्तूबर 1947 को भारतीय व्यवस्था के तहत काम करना मंजूर कर चुके थे।

5. जम्मू और कश्मीर कभी भी ब्रिटिश राज में नहीं आया. उन्होंने कभी कोशिश भी नहीं की. स्वतंत्रता के समय जम्मू-कश्मीर में महाराजा हरि सिंह का शासन था. 1946 में जब एक कश्मीरी पंडित नेहरू अपने लोगों के साथ वहां गए तो कोहाला ब्रिज पर हरि सिंह ने उनको अरेस्ट करवा लिया था. फिर पार्टिशन के समय हरि सिंह को ये आप्शन दिया गया कि चाहे तो भारत या पाकिस्तान के साथ जा सकते हैं. चाहे तो अलग देश बना सकते हैं. हरी सिंह ने अलग देश बनाना कबूल किया।

6. 15अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हुआ. उस समय जम्मू-कश्मीर भारत का अंग नहीं था. उसके बाद अगस्त में कबायलियों के साथ मिलकर पाकिस्तान ने इन पर हमला कर दिया . ये लोग लूट-पाट करते हुए श्रीनगर तक आ गए।

7. तब महाराजा हरि सिंह ने लार्ड माउंटबेटन को चिट्ठी लिखी कि पठान हमलावर मेरे दरवाजे पर आ गए हैं. माउंटबेटन ने जवाब दिया कि ठीक है. पर जब मामला सेटल हो जाये तब लोगों से पूछकर ये तय किया जायेगा कि कश्मीर इंडिया या पाकिस्तान किसके साथ जायेगा. और माउंटबेटन की यही बात भारत-पाक झंझट की वजह बनी।

8. फिर हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को भारत के साथ इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ सक्सेशन पर साइन किया. जम्मू-कश्मीर में 26 अक्टूबर का दिन छुट्टी का दिन होता है. इसी की याद में. वहीं कश्मीरी अलगाववादी इसी काले दिन के रूप में मानकर मातम मानते हैं।

9. उस वक़्त के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू इस मुद्दे को यूएन में ले गए. क्योंकि उस वक़्त राजनीति के आदर्श वही थे. 1948 में यूएन ने इंडिया-पाक के बीच बात करते हुए कहा कि यहां जनमत संग्रह होना चाहिए. पर ये हो नहीं पाया. इसके बदले दोनों देशों में झंझट और बढ़ गयी. 1 जनवरी 1949 को सीजफायर का ऐलान हुआ. मतलब गोली नहीं चलेगी. बहुत लोग ऐसा मानते हैं कि नेहरू अगर इस मुद्दे को यूएन नहीं ले जाते तो भारत कश्मीर रख चुका होता. ये एरिया बहुत ज्यादा फायदे वाला नहीं है. पर दोनों देशों के लिए ये अब इज्जत का मसला है. वहीं कश्मीर भारत का हिस्सा बन गया।

10. पाकिस्तान ने 1963 में चीन के साथ एग्रीमेंट कर नार्थ कश्मीर(गिलगिट-बल्तिस्तान) और लद्दाख का एक हिस्सा उनको दे दिया. इसी रास्ते से चीन पाकिस्तान में रोड बना रहा है. इसी से इंडिया को खतरा है।

11. 1970 के दशक में दोनों तरफ एटम बम की तैयारी हो गई. उसके बाद मामला और जटिल हो गया. 3 जुलाई 1972 को शिमला एग्रीमेंट हुआ जिसमें लाइन ऑफ़ कंट्रोल तय कर लिया गया. वही बॉर्डर तब से चल रहा है।

12. 1988 में पाकिस्तान ने तय किया कि अब डायरेक्ट लड़ाई करके कश्मीर तो ले नहीं पाएंगे. तो अब इंडिया को हज़ार जगह से कट लायेंगे. इसलिए आतंकवादियों को ट्रेनिंग देने की शुरुआत हुई. एक समय कश्मीर में कश्मीरी पंडित, तिब्बती, बौद्ध, सुन्नी मुस्लिम, शिया मुस्लिम, सिख सब रहते थे. पर धीरे-धीरे इस कल्चर को तोड़ दिया गया।

13. इंडिया के पास कश्मीर का 65% हिस्सा है. पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की राजधानी मुजफ्फराबाद है. पाकिस्तान अधिकृत ये एरिया अपने आप को स्वतंत्र देश कहता है पर इसको पाकिस्तान के कंट्रोल में ही माना जाता है. क्योंकि यही सच्चाई है. हालांकि भारत इस कब्जे को अवैध मानता है. मसूद खान इसके प्रेसिडेंट और फारुख हैदर खान इसके प्रधानमंत्री हैं. इस इलाके में पाकिस्तान के किसी भी इलाके से ज्यादा साक्षरता दर है।

 
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Heart catcher

History Facts 👉

1. लोकतंत्र प्रणाली 2,500 साल पहले ग्रीक के Athens शहर में
स्थापित हूई थी। दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्री ढांचा
Iceland में है। यह 930 ईसवी से चला आ रहा है।

2. अपनी मौत के वकत भी कोलंम्बस इस बात से बेखबर रहा कि उसने
जिस महाद्वीप की खोज की है वह भारत नही अमरीका है।

3. डॉलर चिन्ह \'$\' की शुरूआत 1788 से हुई थी।

4. संसार का सबसे पुराना बबलगम 9,000 साल पुराना है।

5. जो सबसे पहली ट्रेन थी उसकी ज्यादा से ज्यादा गति केवल 8
किलोमीटर प्रति घंटा थी।

6. अबतक का सबसे पहले ज्ञात खून का ट्रासफर का काम 1667 से
ज्ञात होता है, जब Jeon baptiste ने दो pints (गैलन का आठवा
भाग जा 0।47 लीटर) खून एक भेंड से एक नौजवान आदमी में
ट्रासफऱ किया।

7. इतिहास में सबसे छोटा युद्ध 1896 में England और Zanzibar
(पुर्वी अफ्रीका में) के बीच हुआ। जिसमें Zanzibar ने 38 मिन्ट बाद
ही सरेंडर कर दिया था।

8. लगभग 3,000 साल पहले, मिसर के वासी 30 साल की उम्र तक
पहुँचने से पहले ही मर जाते थे।

9. February 1865 एक लौता ऐसा महीना इतिहास में रिका्र्ड
किया गया है जिसमे पुर्निमा(पुरा चाँद) न आई हो।

10. 1811 में एक जबरदस्त भुचाल के कारण Mississippi(उत्तरी
अमरीका) नाम की नदी उल्टी दिशा में बहने लगी थी।

11. ग्रीक और बुलगारिया में एक युद्ध सिर्फ इसलिए लड़ा गया था
क्योंकि ग्रीक का एक कुत्ता बुलगारिया का border पार कर
गया था। असल में बात यह थी कि एक ग्रीक सैनिक अपने भूखे कुत्ते
का पीछा करते हुए गलती से बुलगारिया की सीमा में दाखिल हो
गया, बुलगारिया के सिपाहियों ने बिना कुछ जाने उस सैनिक को
गोली मार दी, और फिर दोनो देशों के बीच इस बात को लेकर 18
से 23 अक्तूबर, 1925 के बीच को एक छोटा युद्ध हुआ। इस युद्ध में
बुलगारिया जीत गया था और संधी के तौर पर यह तय हुआ कि
ग्रीक बुलगारिया को युद्ध में हुए नुकसान का मुआवजा देगा।

12. प्राचीन रोमन कैलेंडर में जनवरी और फरवरी के महीने नहीं होते
थे। अतः उनका नव वर्ष 1 मार्च को मनाया जाता है ।

13. सबसे पहले मिले फॅासिल का नाम \'Lucy\' रखा गया था।

14. 21 मार्च 2006 को होली, ईद, गुड फ्राइडे जा ईस्टर(ईसाईयों
का) और नवरोज़(पारसियों का), ये चार धर्मों के चार प्रमुख पर्व
एक ही दिन मनाए गए थे।

15. विश्व में सबसे पुरानी पिज़ा की दुकान इटली के शहर नेपल्स में
1830 में खुली थी जो आजतक अस्तित्व में है।

16. रोम के तानाशाह जूलियस सीज़र ने ईसा पूर्व 45 वें साल में जब
जूलियन कैलेंडर की स्थापना की, उस समय विश्व में पहली बार
1जनवरी को नए साल का उत्सव मनाया गया।

17. मध्यकालीन इतिहास के अत्यंत संपन्न विजयनगर शहर में अब
कोई नहीं रहता, यह नगर हम्पी खंडहरों के नाम से प्रसिद्ध है।

18. मिस्र में 138 पिरामिड हैं लेकिन इनमें से गीज़ा का सिर्फ एक
विशालकाय पिरामिड ही विश्व के सात आश्चर्यों की सूची में
है।

19. फ्रेंच एक समय में इंग्लैंड की अधिकारिक भाषा थी। लगभग 600
साल तक यह इंग्लैंड की अधिकारिक भाषा रही थी।

20. रोम दुनिया का वो शहर है जिसकी आबादी ने सबसे पहले 10
लाख का आकड़ा पार किया था।

21. इंग्लैंड की स्टोनहैंच लगभग 5,000 साल पुरानी है।

22. हम मानव इतिहास के सबसे अच्छे और जबरदस्त समय में रह रहे है।

 
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joy bhati

वो कमीना जिसके हुकुम पर लाखों हिंदुस्तानी मारे गए

एक इंसान जो भारत की आज़ादी के लिए लड़ा. फिर मुसलमानों के हक़ की बात करने लगा. फिर पाकिस्तान बनाने के लिए हजारों बंगालियों को क़त्ल होते हुए देखता रहा. इसका इनाम भी मिला. पाक का प्रधानमंत्री भी बना. पर बाद में उसे अपने ही देश में जलील कर दिया गया. अकेला हो गया था पर तानाशाह अयूब खान इससे डरते थे. इतना कि इसे मार नहीं सकते थे. पूरी ताकत लगा दी इसके प्रभाव को रोकने के लिए. इसे देश छोड़कर लेबनान जाना पड़ा. हुसैन सुहरावर्दी जिसने अपनी जिंदगी में हीरो से विलेन तक का सफ़र कई बार तय किया.

एक जटिल इंसान: ऑक्सफ़ोर्ड से यूनाइटेड मुस्लिम पार्टी तक

बंगाल के मिदनापुर में 8 सितम्बर 1892 को धनी सुहरावर्दी परिवार में जन्म हुआ था हुसैन सुहरावर्दी का. पूरा परिवार सेंट जेवियर्स से लेकर ऑक्सफ़ोर्ड से पढ़ा था. हुसैन सुहरावर्दी ने भी साइंस पढ़ा, फिर लॉ किया और कलकत्ता में प्रैक्टिस करने लगे. कलकत्ता हाई कोर्ट के एक जज की बेटी फातिमा से शादी भी हो गई. पर फातिमा की दो साल के अन्दर मौत हो गई. बेटा शहाब सुहरावर्दी भी 20 का होते-होते मर गया था. हुसैन अपनी जिंदगी में अकेले हो गए थे.

पर हिंदुस्तान का वो वक़्त किसी को अकेला नहीं छोड़ता था. वो भी बंगाल में. 1923 में हुसैन सुहरावर्दी ने सी आर दास की स्वराज पार्टी ज्वाइन कर ली. ये पार्टी कांग्रेस के उलट अंग्रेजों के साथ कन्धा मिलकर संसद में बैठती थी और हर बिल पर धुआंधार बहस करती थी. पर दास के मरने के बाद पार्टी की धार ख़त्म हो गई. और हुसैन सुहरावर्दी ने 1926 में इंडिपेंडेंट मुस्लिम पार्टी बना ली. कांग्रेस नहीं ज्वाइन किया.

इसके साथ ही हुसैन सुहरावर्दी मजदूरों के लिए भी लड़ने लगे. लगभग 36 ट्रेड यूनियन बनाने में हुसैन का हाथ रहा. इसमें मछुआरे, रिक्शावाले, ठेलेवाले सबकी यूनियन थी. 1929 के काउंसिल इलेक्शन में बंगाल मुस्लिम इलेक्शन बोर्ड नाम से अलग संस्था बना दी. 1937 चुनाव में यूनाइटेड मुस्लिम पार्टी भी बना ली. चुनाव लड़ने के लिए.

लड़ के लेंगे पाकिस्तान

उसी वक़्त मुहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान का आइडिया सबके दिमाग में डाल दिया था. राजनीतिक हालात ऐसे बन गए थे कि बहुत लोगों को हिन्दू-मुस्लिम अलग-अलग लगने लगे. हुसैन सुहरावर्दी ने राउंड टेबल कांफ्रेंस में \'मुस्लिम नेता\' के तौर पर भाग लिया. उनके लिए अलग चुनाव की बात भी करते थे.
1937 में चुनाव हुए. 11 ब्रिटिश इंडियन प्रोविंसेज में सिर्फ बंगाल में मुस्लिम लीग फजलुल हक़ की कृषक प्रजा पार्टी के साथ मिलकर सरकार बना पाई. इसका क्रेडिट हुसैन सुहरावर्दी की काबिलियत को जाता है. बंगाल में उनका बहुत रौला था. 1937-43 तक वो पार्टी के सेक्रेटरी थे. इस दौरान लीग की ताकत बहुत बढ़ गई.

1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के बाद पाकिस्तान की मांग बहुत ज्यादा बढ़ गई. मुस्लिम लीग ने इस आन्दोलन में भाग भी नहीं लिया था. इसके बाद क्रिप्स मिशन से लेकर कैबिनेट मिशन तक किसी में कांग्रेस और लीग की नहीं बनी. धीरे-धीरे तय होने लगा कि अब दो देश बनने निश्चित हैं. पर ये राजनीति में ही था. सिर्फ नेताओं के दिमाग में. जनता में इस विचार का बहुत प्रभाव नहीं था. उस वक़्त ना सोशल मीडिया था, ना ही टीवी.

सुहरावर्दी का ग्रेटर बंगाल प्लान, कांग्रेस और मुस्लिम लीग से अलग

1946 में देश में चुनाव हुए. बंगाल में मुस्लिम लीग जीत गई. 121 रिजर्व्ड सीटों में से इनको 114 सीटें मिलीं. इस जीत ने साबित किया कि अब जनता में भी दो देश का विचार फ़ैल चुका है. इस चीज को मुस्लिम लीग ने खूब भुनाया. जब भी पाकिस्तान और \'दो दिलों के टूटने\' की बात होती तो ये लोग इस जीत का जिक्र करते.
पर हुसैन सुहरावर्दी ने एक अलग प्लान भी बनाया था. ईस्ट इंडिया में एक अलग देश की. पूरा बंगाल, असम और बिहार के कुछ जिलों को मिलाकर. इसको ग्रेटर इंडिपेंडेंट बंगाल कहे जाने का प्लान था. हुसैन सुहरावर्दी उस वक़्त बंगाल के मुख्यमंत्री थे. इस प्लान में बंगाल के हिन्दू नेता शरत चन्द्र बोस, किरण शंकर रॉय और सत्य रंजन बख्शी भी शामिल थे. पर ये प्लान फ्लॉप हो गया.

इसी दौरान एक घटना हुई जिसने सारे रिश्ते-नाते बदल दिए. ब्रिटेन से आये कैबिनेट मिशन ने प्लान किया था कि इंडिया को डोमिनियन स्टेटस यानी ब्रिटेन के अंडर रखकर सत्ता ट्रान्सफर कर दी जाएगी. पर मुस्लिम लीग कांग्रेस के साथ किसी भी तरह का जोड़ करने के लिए तैयार नहीं थी. इन्होंने दलील दी कि हिन्दू वाले एरिया हिंदुस्तान और मुस्लिम वाले पाकिस्तान में बांट दिए जाएं. कांग्रेस इस बात पर राजी नहीं हुई.

जिन्ना का डायरेक्ट एक्शन डे और सुहरावर्दी पर क़त्ल का इल्जाम

इसके जवाब में मुहम्मद अली जिन्ना ने कलकत्ता में 16 अगस्त 1946 के दिन \'डायरेक्ट एक्शन डे\' का ऐलान किया. इरादा था अपनी पाकिस्तान की इच्छा को पब्लिक के माध्यम से जगजाहिर करना. उस वक़्त बंगाल में हिन्दू महासभा भी मारवाड़ी व्यापारियों के साथ अपना सपोर्ट जुटा चुकी थी. बंगाल हिन्दू-मुस्लिम में बंट गया था. नेताओं को इस बात का अंदाज़ा था कि क्या हो सकता है. उन्माद और पागलपन की रोज नई खबरें आतीं. पर सब इंतजार करते रहे.
16 अगस्त को प्रदर्शन के साथ झड़प शुरू हुई. और दंगे में बदल गई. ये दंगा 6 दिन तक चला. हजारों लोगों की मौत हुई और लाखों बेघर हो गए. हुसैन सुहरावर्दी पर इल्जाम लगा कि वो खुद लालबाज़ार पुलिस थाने में जाकर मुआयना करते. दंगों के लिए. पुलिस को खुली छूट दे दी थी. मारने के लिए. गवर्नर सर फ्रेडरिक बरो और लेफ्टिनेंट जनरल सर फ्रांसिस टकर ने सुहरावर्दी पर सीधे इल्जाम लगाया. कि डायरेक्ट एक्शन के लिए सुहरावर्दी ने पुलिस को एक दिन की छुट्टी दे दी थी. पर ये नहीं बताया कि उन्होंने अपनी आर्मी को क्यों रोक रखा था. क्योंकि जब आर्मी सड़क पर निकली तो दंगाई भाग गए.

इसी दंगे के बाद सबसे भयानक दंगा नोआखाली में हुआ था. अगस्त 1947 में. हालांकि इसकी भूमिका 1946 से ही बन रही थी. यहां का दिआरा शरीफ हिन्दू और मुसलमान दोनों के लिए धार्मिक जगह था. पर यहां के खादिम गुलाम सरवर ने हिन्दुओं के खिलाफ तकरीरें करनी शुरू कर दी थीं. तकरीरें चलती रहीं, दंगे होते रहे. सैकड़ों लोगों को मार दिया गया. हजारों औरतों का रेप हुआ. हजारों का जबरी धर्म बदलवा दिया गया. नोआखाली के दंगे ने हिंसा का एक अलग रूप दिखाया.
महात्मा गांधी दंगों के दौरान नोआखाली गए. उस इलाके में गए जहां पर मुसलमान ज्यादा मरे थे. वहां उन्होंने सुहरावर्दी से जिद की कि मेरे साथ एक ही घर में रुको. दोनों हैदरी हाउस में रुके. इस बात से जनता में बहुत आक्रोश था. फिर दोनों बाहर निकले, एक अधनंगा और दूसरा सूट-बूट में. एक अहिंसा का प्रेमी और दूसरा हजारों के क़त्ल का इल्जाम लिए हुए.

जनता ने आवाज दी: गांधी, यहां क्यों आये हो? हिन्दुओं का दर्द नहीं दिखता?

गांधी ने कहा: इसीलिए आया हूं. मुझे सबका दर्द दिखता है.

जनता ने कहा: जिंदा नहीं जाओगे.

गांधी ने कहा: मार दो. मुझे डर नहीं लगता सही करने से. मैं उपवास रख रहा हूं.

शाम तक हजारों लोग गांधी के साथ बैठे थे. हर तरह के सवाल-जवाब हुए. नए लड़के गरमा-गर्मी से सवाल पूछते. गांधी प्यार से जवाब देते. दंगा ख़त्म हो गया था. गांधी दंगे में बेघर लोगों के आंसू पोंछ रहे थे.

पाकिस्तान में सुहरावर्दी को नहीं मिली जगह
पाकिस्तान बनने के बाद सुहरावर्दी को दरकिनार किया जाने लगा. क्योंकि डर था कि सुहरावर्दी अपने बंगाल की मांग पर ना अड़ जाएं. सुहरावर्दी को पूर्वी पाकिस्तान का मुख्यमंत्री भी नहीं बनाया गया. इनकी जगह पर एक छोटे नेता नज़ीमुद्दीन को सत्ता दे दी गई. फिर एक चीज भी बदल गई थी. जिन्ना की मुस्लिम लीग इस्लाम लेकर चलती थी. सुहरावर्दी की अवामी लीग सेक्युलर थी! सुहरावर्दी को वेस्टर्न कल्चर से भी लगाव था. बाद में प्रधानमंत्री बने थे, पर बहुत कम समय के लिए. तब तक पाकिस्तान हर किसी के हाथ से निकल चुका था. कहते हैं कि सुहरावर्दी को ज्यादा मौका मिलता तो शायद पाकिस्तान का ये हाल ना होता.

सुहरावर्दी के ही शिष्य मुजीब ने अवामी लीग को फिर से उठाया और 1971 में पाकिस्तान से काटकर बांग्लादेश बना दिया. सुहरावर्दी का ग्रेटर बंगाल तो नहीं बन पाया, पर पाकिस्तान जरूर टूट गया.
ये कोई बता नहीं सकता कि किसी की जिंदगी क्या मोड़ लेगी. कोई क्या फैसले लेगा. पर सुहरावर्दी की तरह का आदमी हमेशा इतिहास के कठघरे में रहता है. इतना जटिल आदमी, जो अपने हर काम के साथ इतिहास मोड़ देता है. जो डरते हुए भी किसी की जान ले सकता है. कमजोर होने के बावजूद तानाशाहों को डरा सकता है. और अंत में हजारों के खून का इल्जाम लिए जनता का नेता हिंदुस्तान-पाकिस्तान-बंगाल सबसे दूर लेबनान में अकेले मरता है.

 
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Sam's Son

What is Diwali Bonus?

Initially there was a concept of salary to be paid on a weekly basis to the workers in India, particularly the textile and flour mill workers in Bombay.

So you received 52 salaries in a year.

But when British started ruling India they came up with concept of Monthly salary which meant you were getting paid for 48 weeks only.

So if we have 4 weeks in a month, 13 salaries should have been distributed but as per a monthly structure they were giving only 12 salaries in a year.

When people realized that this was a loss to them in terms of one salary many protest rallies were organised in Maharashtra during 1930-1940.

The British then came up with a solution to this problem.

After discussion with labour leaders about how to distribute this 13th salary and they decided Diwali being the biggest festival of India, they would distribute this 13th salary durring Diwali.
Today this is called the Diwali Bonus.

This was implemented from 30th June 1940.

Many don't know the history behind the Diwali Bonus and hence this post.

 
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666 days
 
Dimpy

ये रत्न 9 ही क्यों थे और सबसे पहले किसके पास थे?

जीनियस लोगों के ग्रुप पुराने वक्त से ही बड़े चलन में थे. इनमें से कुछ ग्रुप सीक्रेट भी हुआ करते थे. लेकिन लगता है ऐसा ग्रुप बनाने वाले राजा-महाराजा लोगों को 9 नंबर से बड़ा प्यार था.
ये सुनते ही आपके दिमाग में अकबर के नवरत्न आ गए होंगे, हैं न? ये उस वक्त के 9 जीनियस लोगों का ग्रुप था, जिसे बादशाह अकबर ने दरबार में ख़ास जगह दे रखी थी.

बीरबल
बीरबल यानी महेश दास. ये एक कवि होने के साथ-साथ अकबर के दरबार में सलाहकार भी थे. लेकिन हम बीरबल को ऐसे कहां जानते हैं. हम लोगों ने तो अकबर-बीरबल के किस्से पढ़े हैं. वही जिसमें बीरबल हर बार अपने स्मार्ट जवाब या कमेन्टबाज़ी से अकबर का दिल जीत लेते हैं. लेकिन आजकल तो क्लास के सबसे स्मार्ट कमेंट करने वाले बच्चे को क्लास से ही निकाल दिया जाता है. कहां से कोई \'रत्न\' मिलेगा! वैसे ये किस्से कितने सच्चे हैं, कहा नहीं जा सकता. बीरबल यूं तो हंसोड़ मिजाज आदमी थे, पर मारे गए युद्ध के मैदान में.

अबुल फ़ज़ल
ये बड़े कमाल के स्कॉलर थे. अकबरनामा इन्होंने ही लिखा था. वही अकबरनामा जिसमें उस वक्त के भारत की ढेरों जानकारियां मिलती हैं. खेती, ज़मीन से लेकर टैक्स वसूली और बादशाह के कुनबे की पूरी कहानी. सब कुछ है इस किताब में. ये किताब तीन हिस्सों में है, जिसका अंतिम हिस्सा सबसे ज्यादा फ़ेमस है. इस अंतिम हिस्से को आइन-ए-अकबरी कहते हैं. अपने बड़े भइया के साथ ये भी सूफिज्म में बड़ी दिलचस्पी रखते थे.

फैज़ी
फैज़ी भी बड़े गज़ब के स्कॉलर और कवि थे. आखिर अबुल फ़ज़ल के बड़े भइया जो थे. इनके दीवान, यानी कविता के संग्रह में ग़ज़ल, कसीदे और रुबाई, सब कुछ थे.

टोडरमल
टोडरमल उस ज़माने के फाइनेंस मिनिस्टर थे. मतलब उनके हाथ में ही बजट वगैरह रहते होंगे. बड़े काबिल आदमी थे. ज़मीन को नापने और उस पर टैक्स की कैलकुलेशन करने के बिलकुल शानदार तरीके ये जनाब ही ले कर आए थे. आज भी गांवों में पटवारी और उनकी पूरी टीम जो ज़मीन-जायदाद के काम देखती है, वो टोडरमल के ही इस आइडिया की देन है. टैक्स वसूलने के भी एक से एक आइडिया थे इनके पास. हमने तो सुना है इनके ऊपर कुछ वीडियो गेम भी बनाए गए हैं.

मान सिंह
पहले तो ये राजपूताना के एक राजा थे. और इनके राज्य का नाम बड़ा खूबसूरत था, आमेर. जिसे अम्बर भी बोला जाता था. इनकी बुआ की शादी अकबर के यहां हो गई थी. फिर ये अकबर के साथ हो लिए. महाराणा प्रताप से अकबर की जो लड़ाई हुई थी, उसमे मान सिंह ही आर्मी की कमान संभाल रहे थे. इसी चक्कर में फंस भी गए थे. क्योंकि अकबर को एक टाइम पे ये लगा कि अंदर ही अंदर मान सिंह महाराणा प्रताप से मिले हुए हैं. हालांकि ऐसा साबित नहीं हुआ था.

रहीम
इनको तो सभी जानते हैं. बचपन से ही कितने दोहे पढ़े होंगे जो \'कहे रहिमन.\' से शुरू होते थे. ये दोहे के अलावा ज्योतिष विद्या पर भी लिखा करते थे. अच्छा आपको पता है इनका पूरा नाम क्या था? इनके खुद के नाम के अलावा दरबार से मिले टाइटल वगैरह भी थे. और सब कुछ मिलाजुला के अब्दुर रहीम खानेखानान नाम पड़ता था इनका.

फ़क़ीर आज़ाओ-दिन
जैसा कि इनके नाम से पता चलता है, ये फ़क़ीर थे. फिर ये अकबर के दरबार में क्या कर रहे थे? ये वहां धार्मिक और आध्यात्मिक मामलों में सलाह देते थे.

तानसेन
मियां तानसेन को कौन नहीं जानता! संगीत का कोई ऐसा घराना नहीं है भारत में, जो खुद को तानसेन से न जोड़ता हो. गाना गा कर आग लगा देने और बारिश कर देने के किस्से मशहूर हैं इनके. सच्ची में आग-बारिश हुई थी या नहीं, हमें नहीं पता. कुछ म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट्स भी हैं, जिन्हें तानसेन ने ही बनाया था, ऐसा लोग कहते हैं.

मुल्ला दो प्याज़ा
इनके बारे में कोई ख़ास ऐतिहासिक जानकारी नहीं मिलती है. लेकिन लोगों का मानना था कि ये दिमाग लगाने और स्मार्ट जवाब देने में बीरबल के कॉम्पिटिटर थे.


एक और 9 जीनियस लोगों का ग्रुप था. जिसके बारे में कम ही लोग जानते हैं. इन्हें भी नवरत्न ही कहा जाता था. ये नवरत्न थे गुप्त वंश के चन्द्रगुप्त द्वितीय यानी चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के दरबार में. ये भी 9 धाकड़ किस्म के लोग थे.

अमरसिंह
ये संस्कृत के बहुत बड़े ज्ञानी थे. साथ ही कविताएं भी लिखते थे. इनके \'अमरकोश\' में संस्कृत शब्दों की पूरी जांच-पड़ताल की गई थी.

धन्वंतरि
कभी घर में कोई एक्सपर्ट बनकर दवाएं बताए, या किसी चीज़ के पच्चीसों इलाज बताए, तो उसे कहा जाता है- \'ज्यादा धन्वंतरि मत बनो.\' धन्वंतरि थे ही ऐसे कमाल के मेडिकल एक्सपर्ट.

हरिसेन
हरिसेन चन्द्रगुप्त के \'कोर्ट पोएट\' कहे जा सकते हैं. पुराने ज़माने में आज की तरह फेसबुक और ट्विटर तो होता नहीं था. इसलिए राजा लोग पत्थरों पर अपने और अपनी पालिसी वगैरह के बारे में लिखवाते थे. ऐसी ही एक बड़ी सी कविता इलाहाबाद में मिली थी. हरिसेन ने ही इलाहाबाद के उस \'प्रयाग प्रशस्ति\' में राजा चन्द्रगुप्त के बारे में कविता लिखी थी.

कालिदास
ये वही फ़ेमस नाटककार हैं जिन्हें सब जानते हैं. अक्सर इन्हें \'भारत का शेक्सपियर\' कह दिया जाता है. शायद इसलिए कि शेक्सपियर ने जो नाटक लिखे, वो अंग्रेजी साहित्य में \'क्लासिक\' माने जाते हैं और कालिदास ने जो नाटक लिखे, वो संस्कृत के \'क्लासिक\' माने जाते हैं. लेकिन कालिदास को \'भारत का शेक्सपियर\' कहना कहां तक सही है जब कालिदास शेक्सपियर से सैकड़ों साल पहले अपने नाटक लिख गए थे. और जिस तरह एक नाटककार को \'क्लासिक\' डिफाइन करने का पैमाना मान लिया जाता है, ये भी सवाल उठाने लायक है. \'मेघदूतम\', \'रघुवंशम\', \'ऋतुसंहारम\' और \'अभिज्ञानशाकुंतालम\' जैसी कालजयी चीज़ें यही भाईसाहब लिख गए थे.

कहापनाका
इनके बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं मिलती है. हां, इतना पता है कि ये ज्योतिष विद्या के एक्सपर्ट थे. ग्रह-नक्षत्र के दांव-पेंच, उसकी दशा-दिशा में माहिर थे ये.

संकू
संकू आर्किटेक्ट थे. ये भाईसाहब उस ज़माने के \'रेबेल\' रहे होंगे. हां, आर्किटेक्चर जैसा \'हटके\' करियर ऑप्शन चुनने के लिए बड़ा दिल चाहिए होता है.

वराहमिहिर
ये कमाल के साइंटिस्ट थे. मैथ्स, एस्ट्रोनॉमी और ज्योतिष विद्या, तीनों के एक्सपर्ट थे. तीन किताबें लिख डाली थी इन्होंने. \'पंचसिद्धान्तिका\' नाम की किताब में इन्होने मैथ्स और एस्ट्रोनॉमी के 5 बड़े सिद्धांत दिए थे. इनमें से सबसे फ़ेमस था सूर्य सिद्धांत. दूसरी किताब थी \'बृहतसंहिता\'. जिसमें साइंस से जुड़ी ढेरों रोचक जानकारियां थीं. तीसरी किताब थी \'सांख्यसिद्धांत\'. वराहमिहिर ने ग्रीक ज्योतिष विद्या पर भी लिखा था.

वारारुचि
ये संस्कृत के स्कॉलर थे. ये भी संस्कृत भाषा, और ख़ासकर व्याकरण के गज्ज़ब के जानकार थे.

वेतालभट्ट
ये जादूगर थे. हमें नहीं पता क्या-क्या गायब किया होगा इन्होंने. लेकिन रहे होंगे ये कमाल के जादूगर ही. तभी तो नवरत्न में शामिल हुए थे.

इन दोनों नवरत्नों के ग्रुप से पहले भी एक 9 जीनियस लोगों का ग्रुप बनाया गया था. इन लोगों को चुना था सम्राट अशोक ने. लेकिन इन्हें नवरत्न नहीं कहा जाता था. फिर क्या कहा जाता था? हमें क्या पता? हां, सच्ची. हमें क्या पता. क्योंकि ये एक सीक्रेट ग्रुप था.

साइंटिफिक और तकनीकी से जुड़ी नई खोज गलत लोगों के हाथों में न पड़े, ये बहुत ज़रूरी होता है. अंदाज़ा लगाया जाता है कि इसी काम के लिए इन 9 जीनियस लोगों का सीक्रेट ग्रुप बनाया गया था. इनके बारे में कोई ख़ास जानकारी नहीं मिलती है. बस ये बताया जाता है कि इन लोगों की ये सीक्रेट पहचान कोई नहीं जानता था. और इन सब के पास एक किताब थी. जिसमें शायद खुफिया साइंटिफिक जानकारियां दर्ज थीं.

अब एक बार जो \'नवरत्न\' शब्द पॉपुलर कल्चर में आया, फिर तो चल ही पड़ा. वैसे तो भारत के 9 PSU यानी पब्लिक सेक्टर यूनिट हैं, इनके ग्रुप को भी नवरत्न कहते हैं. लेकिन आज के समय में जो सबसे भारी-भरकम और असरदार इस्तेमाल है इस शब्द का, वो तो नवरत्न तेल की शीशी पर ही है.

 
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I am Indian
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