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उनकी तो फिल्म भी नहीं दिखाते, फिर हर बार ऐश्वर्या और सोनम Cannes क्यों जाती हैं?

हर साल कान फिल्म फेस्टिवल होता है. वहां होता है एक रेड कारपेट. जिसमें बड़े बड़े एक्टर पहुंचते हैं. और हमारे मीडिया को कुछ दिनों का रोजगार मिल जाता है. क्योंकि हर बार सोनम कपूर, दीपिका पादुकोण, ऐश्वर्या राय तरह-तरह के गाउन पहन के पहुंचती हैं. और हां, कोई जाए न जाए, ऐश्वर्या जरूर पहुंचती हैं. चाहे फ़िल्में कर रही हों या नहीं, साल के कुछ दिन ऐश्वर्या अपने तरह तरह के गाउन से खा जाती हैं. गाउन से नहीं तो बैंगनी होंठों से. खैर.

तो आपने कभी सोचा है कि हर बार ऐश्वर्या क्यों पहुंचती हैं. काजोल, करिश्मा कपूर, करीना, प्रीती जिंटा क्यों नहीं. और उनके पीछे पीछे पहुंचती हैं सोनम कपूर. क्या इन दोनों के पास किसी तरह की मेंबरशिप है?

इंटरनेशनल ब्रांड लोरियाल पेरिस पिछले कई सालों से कान फिल्म फेस्टिवल का \'ब्यूटी\' पार्टनर है. इंडिया से ऐश्वर्या और सोनम लोरियाल की ब्रांड एम्बेसडर हैं. कटरीना और दीपिका भी रह चुकी हैं. यामी गौतम नहीं रही हैं. वो फेयर एंड लवली के ऐड में आती हैं, लोरियाल के ऐड में नहीं. इसलिए वो कान फिल्म फेस्टिवल में भी नहीं जातीं. तो सोनम और ऐश्वर्या आपको लगातार कान फिल्म फेस्टिवल में इसलिए दिखाई पड़ती हैं कि लोरियाल उन्हें स्पॉन्सर करता है. जब पूरा मीडिया ऐश्वर्या, दीपिका और सोनम के गाउन कवर कर रहा होता है, असल में लोरियाल का प्रचार कर रहा होता है. सीधे तौर पर नहीं, पर लोरियाल की मॉडल्स के तौर पर.

लेकिन ये लोग कान फेस्टिवल में जाकर क्या करती हैं?

यानी कान फिल्म फेस्टिवल में होता क्या है? शुरू से शुरू करते हैं. कान, फ़्रांस देश का एक शहर है. जो अपने महंगी लाइफस्टाइल, लग्जरी होटलों से भरा हुआ है. खूब पैसा उड़ाने वाले लोगों की मेजबानी करता है. बड़े-बड़े अंतर्राष्ट्रीय इवेंट यहां होते रहते हैं. क्योंकि शहर भी सुंदर है. जनसंख्या भी काफी कम है.

फिल्म फेस्टिवल यहां 1946 में शुरू हुआ. कान फिल्म फेस्टिवल में भी वही होता है जो हर फिल्म फेस्टिवल में होता है. लोग अपनी फ़िल्में भेजते हैं. फ़िल्में सेलेक्ट होती हैं. अच्छी फिल्मों की स्क्रीनिंग होती है. फिल्म की दुनिया से बड़े बड़े स्टार आते हैं. हर देश से. हर देश से मीडिया आता है. कुल मिलाकर कान फिल्म फेस्टिवल में बड़े बड़े एक्टर आते हैं, महंगे होटलों में ठहरते हैं, फोटो खिंचाते हैं, खबर बनवाते हैं. इन्हीं सब के बीच फेस्टिवल का मूल मकसद भी कहीं पूरा हो रहा होता है. यानी नई नई फिल्मों, फिल्मकारों को बढ़ावा देने का.

हर स्क्रीनिंग के बाद एक प्रेस कॉन्फेरेंस होती है. जिसमें पत्रकार काफी सारे गैरज़रूरी सवाल पूछते हैं.

जो लोग फ़िल्में बना रहे हैं, वो भी जाते हैं. अपनी फ़िल्में दिखाने. लेकिन अपनी फिल्म दिखाना, या बिना दिखाए एंट्री पाना आसान नहीं है.

अगर आप एक अधिकृत फिल्म बनाने वाले या एक्टर हैं तो ये राह आसान हो जाती है.

अगर आप ये दिखा दें कि आप किसी फिल्म में पैसा लगा रहे हैं, या फिल्म बनाने जा रहे हैं, तो आपको एंट्री मिल जाएगी. अगर आपके पास अपनी बनी-बनाई फिल्म है, तो आपको 4 से 8 हजार रूपये तक खर्च कर एंट्री \'बैज\' मिल जाएगा. मगर अगर बिना कुछ किए ही अंदर घुसना चाहते हैं जिससे आप बड़े बड़े हीरो-हिरोइन को देख सकें, फेसबुक पर तस्वीर डाल सकें, तो आप खुद को प्रड्यूसर बता सकते हैं. आपको बस ये कहना होगा कि आप फिल्म में पैसा लगाना चाहते हैं. मगर इस तरीके से लगभग 25 हजार रूपये ठुकेंगे \'मार्केट बैज\' खरीदने में.

अगर आप केवल स्टार-भक्ति में नहीं, बल्कि सीरियसली फ़िल्में देखने जाना चाहते हैं, तो पूरे कान शहर में फेस्टिवल के दौरान फिल्मों की स्क्रीनिंग होती रहती है. कहीं टिकट लगता है, तो कहीं फ्री में होती है. ये टिकट आसानी से खरीदे भी जा सकते हैं. या फिर मुफ्त देख सकते हैं. और हां, अगर आप कान शहर के रहने वाले हैं, यानी परमानेंट एड्रेस अगर कान शहर का है, तो ये सारी स्क्रीनिंग आपके लिए मुफ्त होंगी.
तो असल में जितने स्टार कान फिल्म फेस्टिवल में जाते हैं, जरूरी नहीं वहां उनका कोई काम हो. या उनकी फिल्म दिखाई ही जा रही हो. ये स्टाइल और स्टेटस सिंबल है. और अगर आपकी कोई फिल्म न भी आ रही हो तो बहुत सुंदर या बहुत घटिया कपड़े पहनकर न्यूज़ में छाने का मौका है.

 
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