Message # 461426

*छत पे सोये बरसों बीते*
*तारों से मुलाक़ात किये*
*और चाँद से किये गुफ़्तगू*
*सबा से कोई बात किये।*

*न कोई सप्तऋिषी की बातें*
*न कोई ध्रुव तारे की*
*न ही श्रवण की काँवर और*
*न चन्दा के उजियारे की।*

*देखी न आकाश गंगा ही*
*न वो चलते तारे*
*न वो आपस की बातें*
*न हँसते खेलते सारे।*

*न कोई टूटा तारा देखा*
*न कोई मन्नत माँगी*
*न कोई देखी उड़न तश्तरी*
*न कोई जन्नत माँगी।*

*अब न बारिश आने से भी*
*बिस्तर सिमटा कोई*
*न ही बादल की गर्जन से*
*माँ से लिपटा कोई।*

*अब न गर्मी से बचने को*
*बिस्तर कभी भिगोया है*
*हल्की बारिश में न कोई*
*चादर तान के सोया है।*

*अब तो तपती जून में भी न*
*पुर की हवा चलाई है*
*न ही नानी माँ ने कथा*
*कहानी कोई सुनाई है।*

*अब न सुबह परिन्दों ने*
*गा गा कर हमें जगाया है*
*न ही कोयल ने पंचम में*
*अपना राग सुनाया है।*

*बिजली की इस चकाचौंध ने*
*सबका मन भरमाया है*
*बन्द कमरों में सोकर सबने*
*अपना काम चलाया है।*

*तरस रही है रात बेचारी*
*आँचल में सौग़ात लिये*
*कभी अकेले आओ छत पे*
*पहले से जज़्बात लिये!!!*

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