Message # 446593

एक दुखी आशिक की शायरी :

मेरी "चूत-नसीबी" का आलम कुछ ऐसा है, ऐ ग़ालिब;
मेरे सभी दोस्त 'महाचूतिया' हैं, फिर भी हम इक अदद 'चूत' को तरसते हैं।

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