Message # 445090

मैं चाहता हूँ
लिखना
एक इंटरमार
झांटू सी कविता
जिसे पढ़के के
लोगों के
दिल से आह
आँखों से लहू
कान से मवाद
और
गांड़ से धुंआ निकल जाए
मैं चाहता हूँ
कि मैं
ऐसा कवि बनूं
जो अपनी टुच्ची कविताओं से
नितम्बों पर आय से अधिक मांसपिंड लेकर चलने वाली
अधेड़ फूल पत्ती महिलाओं
को अपना फैन बना लेता हो.
मैं चाहता हूँ
कि एक दिन
फेसबुक लाइव आकर
अपनी बकचोदी भरी बातों से
लोगों के टाइमलाइन में
लंका लगा दूँ.
और मैं बनना चाहता हूँ
वो सरीफ बंदा
जिसे महारत हो
रचाने में
सराफत का ढोंग
और आता हो
चुपके से लड़कियो के फेसबुक डीपी को
ज़ूम करके घण्टो निहारने का हुनर.
वो शरीफ जो फेसबुक पर
महिलाओं के लिए उठाता हो झंडा
इनबॉक्स में मांगता हो उनसे न्यूड पिक्स
और गैलरी में सेव करके रखता हो उनके फ़ोटोज़.
और मैं ये भी चाहता था
कि एक दिन आठ बजे ही
घटिया सा दारु रॉयल स्टैग पीकर
लिख दूँ ऐसे पोस्ट.
सब नही
पर आज ये वाली चाहत खुद की
कर दी पूरी. !!!
सिया बर राम चन्द की जय
तेरी आंख्या का यो काजल
छलकत हमरो जवनिया ये राज़ा
यादवजी को साइयां बना लीजिए
याद करो तुम उस बगिया को, जिस बगिया में तुमको रेला था. तुम सुसुक सुसुक के रोइ थी, मैं हुचुक हुचुक के पेला था !!
😊😊😊

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