Message # 443568

जन्मदिन मुबारक बीकानेर
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ऊंठ मिठाई इस्त्री सोनो गेणो साह
पांच चीज पिरथी सिरै वाह बीकाणा वाह।

रेगिस्तानी जहाज ऊंठ ,मिठाई ,स्त्री ,सोना गहना और साहूकारों के लिए कवि को पृथ्वी पर श्रेष्ठ शहर लगने वाला बीकानेर आज अपना 531 वां जन्मदिन मना रहा है।

पनरे सौ पैंताळवे सुद बैसाख सुमेर
थावर बीज थरपियो बीके बीकानेर।

अल्हड़ अलबेला मस्ताना शहर अपने संस्थापक राव बीका के हठ को आज भी अपने स्वभाव में थामे हुए है।पिता राव जोधा के ताने को चुनोति मान बीका अपने काका राव कांधल के साथ राज बनाने निकले तो रेतीले धोरो को फतेह करते हुए जांगळ प्रदेश में विक्रम संवत् 1545 में माँ करनी के आशीर्वाद से एक भेड़पालक किसान के कहे स्थान पर इस नगर की नींव थरपी।

राजशाही के काल में राव बीका से लेकर महाराजा सादुल सिंह तक के काल में कुल 23 शासको में महाराजा गंगा सिंह सर्वाधिक विजनरी शासक रहे। अक्तुबर 1931 में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में जाने के लिए महात्मा गांधी को सहमत करने वाले गंगा सिंह ही थे जिन्होंने गांधी जी की यात्रा की सारी व्यवस्था की। गंग नहर ,बीकानेर रेलवे जैसे जन हितेषी काम करवाने वाले महाराजा को शहर के जन्मदिन के दिन याद करना लाजमी है।

531 सालो के इतिहास में इस शहर का साम्प्रदायिक सौहार्द गौर करने लायक है। सूरज निकलने से पहले मन्दिर की घण्टियाँ और मस्जिदों में अजान के स्वर एक साथ मिलकर इस शहर का संगीत बुनते है वही गिरजाघरों में प्रार्थना के लिए बुदबुदाते होठ और गुरूद्वारे में अरदास के लिए पलटते पन्ने फिजाओ में प्रेम और आध्यात्म का राग अलापते है। कोटगेट के भीतरी सड़क दाऊ जी रोड पर नोगजा की दरगाह और दाऊ जी मन्दिर में एकसाथ दोनों धर्म के लोग मत्था टेकते है। इसीलिए तो कहा है-

बीकानेर की संस्कृति जैसी सांझी खीर
नोगजा मेरे देवता दाऊजी मेरे पीर ।

इतिहास गवाह है इन सवा पांच सौ सालो में कोई इस संस्कृति को क्षति नही पहुंचा पाया। आजादी से पहले के साम्प्रदायिक दंगे हो चाहे विभाजन की विभीषिका या फिर बाबरी मस्जिद टूटने की घटना इस शहर ने अपने परकोटे में बाहरी अजनबी हवा को घुसने नही दिया। यहां तक कि यहां के राजनेताओ की जोड़ी मक्खन अली (मक्खन जोशी) और महबूब जोशी(महबूब अली) को इसी नाम से जाना जाता रहा।

काशीनाथ सिंह के उपन्यास 'काशी का अस्सी' पढ़ते हुए आपको अहसास होता है कि बीकाणा बनारस का जुड़वा शहर सा है इसीलिए तो इसे छोटी काशी कहा जाता है।
शहर के भीतरी भाग में बसा पुराना शहर अपने पाटों पर पूरी रात जागता है।पाटों की हथाइयो में "क्या ल्यायो" और "पगे लागणा" से शुरू होकर गांव गवाड से ठेठ अमेरिका के ट्रम्प और रूस के पुतिन तक की चर्चाए होती है। ज्योतिषीय ज्ञान में शहर का हर तीसरा आदमी पारंगत है वही थियेटर से लेकर म्यूजिक ,पेंटिंग, पोएट्री ,नॉवेल और स्टोरी राइटर भी बड़ी संख्या में है तभी हर सप्ताह पुस्तक लोकार्पण से लेकर साहित्यिक चर्चाए तक के आयोजन भीड़ भरे रहते है।
स्व. हरीश भादाणी ,स्व. छगन मोहता और स्व. यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र का यह शहर धीर गम्भीर नंदकिशोर आचार्य से लेकर नई पीढ़ी के कई नामी गिरामी लेखको विचारको को अपने में समेटे है जो इस जमी पर दर्शन विचार की नगर चेतना को बनाए हुए है।
यहां की होली तो जग प्रसिद्ध है ही । होलका के दिनों में अश्लील गीतों के बहाने कुंठा को निकालते अलबेले अलमस्त लोगो की बात ही निराली है।
रसगुल्लों की मिठास और भुजिया का तीखापन इस शहर में एक साथ मिलता है ।खाने खिलाने के शौकीन शहर के अंदरुनी भाग में आधी से अधिक दुकाने खाने पीने की चीजो की नजर आती है । यहां कि चाय पट्टी किसी बड़े शहर का कॉफ़ी हाउस सा है जहां कभी अज्ञेय अपने दोस्तों के साथ गम्भीर साहित्यिक चर्चाए करते थे। आजकल वहाँ दिन उगते ही आँख मलते लोग कचोरी समोसों से दिन की शुरुआत करने आते है। शायद अज्ञेय ने ही कहा था ," बीकानेर के आधे लोग कचोरी बनाते है और आधे लोग खाते है।"

इस खान पान और मस्ती के बीच भी लोग गहरे और गम्भीर है। इसी लिए तो कहा है -

जळ ऊँडा थळ उजळा पाता मैंगल पेस
बळिहारी उण देस री रायसिंघ नरेस ।
(पानी जितना गहरा है उतनी गहराई और सूझबूझ यहां के लोगो में है।ऐसे देश पर बलिहारी जानें का मन करता है।)

देश आजाद हुआ तो बीकानेर पहली रियासत थी जहां के शासक सादुल सिंह ने सबसे पहले भारत संघ में विलय पर हस्ताक्षर किए। लोकशाही के दौर में मुरलीधर व्यास जैसे जननेता हुए जिन्होंने तत्कालिक मुख्यमन्त्री को मांग न मानने तक शहर में घुसने न देने की चेतावनी दे डाली।
प्रजा परिषद से लेकर कांग्रेस ,समाजवाद और वामपंथ जैसे विचारो में रंगे अलग अलग खेमे के धुरन्धरो के बावजूद सामूहिक नगर चेतना कभी खण्डित न हुई।
एक ऐसे दौर में जब पुरे मुल्क में साम्प्रदायिक उन्माद चरम पर है और सियासत नफरत की खेती कर रही है यहां की फिजाए भी कुछ बदली सी नजर आती है बावजूद इसके सवा पांच सौ सालो की विरासत अटूट प्रेम को मजबूती से थामे हुए है , मरहूम शायर अजीज आजाद कहते है
मेरा दावा है सब जहर उतर जाएगा
तुम मेरे शहर में दो दिन तो ठहर के देखो।

आज अपने शहर के पांच सौ तीसवें जन्मदिन पर शहरवासी परम्परा को निभाते हुए बाजरे के खिचडे के 'सबड़के' लेते हुए इमली पानी के साथ घरो की छतो पर किनो(पतंग) के पेच लड़ाते हुए 'बोय काट्यो -बोय काट्यो' के हाके मचा रहे है।

इस यौम ए पैदाइश के दिन तुम्हे जन्मदिन मुबारक बीकानेर, बस यही दुआ है तुम्हे किसी की नजर न लगे।

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