Message # 437841

लोकतन्त्र को खतरा किससे है यह सच मैं विचारणीय है।उच्चतम न्यायालय की रोस्टर सम्बन्धि प्रक्रिया से या निर्णयों की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगने से ???
प्रेस कान्फ्रेस के तुरन्त बाद कांग्रेस को जस्टिस लोया केस ही नजर आया। जस्टिस लोया केस की उच्चतम न्यायालय में सुनवाई से वरिष्ठ अधिवक्ता दवे और जयसिंह को आपत्ति क्यों ।जस्टिस लोया की मृत्यु 1दिसम्बर 2014को हुई थी जब वो नागपुर शादी में गए थे। उनके पुत्र अनुज लोया और बोम्बे हाईकोर्ट के जज भूष्ण गवई जो उनके साथ थे ने कहा था कि मृत्यु में कोई संदिग्धता नहीं है, पर फिर भी इसे संदिग्ध बना दिया क्योंकि जस्टिस लोया सोहराबुदीन प्रकरण की सुनवाई कर रहे थे और इसमें बाद में अमित शाह और अन्य की रिहाई हई। क्या उच्चतम न्यायालय के चारों जजों को अपनी ही अन्य बेंच पर संदेह है या भाजपा नेता के अनुसार ये चीफ़ जस्टिस द्वारा जो फरवरी माह से रामजन्मभूमि पर प्रतिदिन सुनवाई रखी है ये उस से संबंधित है, क्योंकि प्रेस कान्फ्रेन्स के बिन्दु उन्हीं से सम्बन्धित थे जो अधिवक्ता दवे ने अपने अंग्रेजी अखबार के लेख में लिखे थे।अगर मेडिकल स्केम केस से सम्बधित रोस्टर से शिकायत थी तो उसे राष्ट्रपति को विचारार्थ प्रेषित किया जा सकता था,पर मिडिया में मतभेद लाकर स्वयं न्यायपालिका ने अपने ऊपर प्रश्नचिहन लगाया है। उच्चतम न्यायालय के निर्णयों को राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाएगा यह वास्तव में संवैधानिक मूल्यों के विपरीत होगा । निर्णयों के तथ्यों या निष्पक्षता के ऊपर भी राजनीतिक प्रभाव बताया जाएगा।
लोकतन्त्र के सबसे मजबूत स्तम्भ और संविधान रक्षक न्यायपालिका की कार्यशैली पर बहस होना ही अत्यन्त दुखद है क्योंकि न्यायपालिक की निष्पक्षता ही आम व्यक्ति की अन्तिम आस है।
पर इस बहस को जन्म भी स्वयं न्यायपालिका ने ही दिया है।

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