Message # 432211

*आइंस्टाइन की लिखी इस चिट्ठी में छुपा है दुनिया की बर्बादी का फ़ॉर्म्युला*

आइंस्टाइन ने अगस्त 1939 में एक चिट्ठी लिखी थी. ये चिट्ठी 11 अक्टूबर, 1939 को अपनी मंजिल पर पहुंची. ये चिट्ठी इतिहास के सबसे अहम दस्तावेजों में से एक है. दुनिया आज जिन न्यूक्लियर हथियारों के ढेर पर बैठी है, उसकी बुनियाद में ये चिट्ठी ही है. दुनिया में आज तक केवल दो जगहों पर परमाणु हमले हुए. जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर. ऐटम बमों के इन हमलों से भी आइंस्टाइन का बहुत करीबी रिश्ता था. ये जो इतिहास है, वो 11 अक्टूबर की इस तारीख के साथ नत्थी है.

अल्बर्ट आइंस्टाइन. विज्ञान का सबसे लोकप्रिय चेहरा. E=mc2. इस छोटे से फॉर्मूले ने दुनिया बदल दी. थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी. विश्व की अब तक की सबसे महानतम खोजों में से एक. इसी के दम पर आइंस्टाइन को अब तक का महानतम वैज्ञानिक मानते हैं. आइंस्टाइन निर्माण में यकीन करते थे. खुद को अमनपसंद, शांतिवादी कहते थे. वो थे भी. 1929 में आइंस्टाइन ने कहा था. अगर युद्ध छिड़ता है, तो वो वॉर सर्विस नहीं करेंगे. ना प्रत्यक्ष, ना अप्रत्यक्ष. उन्होंने कहा था:

भले ही लोग कहें कि युद्ध करने की वजह बहुत महान है, मैं तब भी जंग में शामिल नहीं होऊंगा.

जंग को नापसंद करने वाले आइंस्टाइन को जंग ने ही बदला. दूसरे विश्व युद्ध ने. वो अब भी शांति की वकालत करते थे, पर थोड़े बदल गए थे. उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति फ्रेंकलिन डी. रूजवेल्ट को एक चिट्ठी लिखी थी. आइंस्टाइन ने 2 अगस्त, 1939 को ये चिट्ठी लिखी थी. रूजवेल्ट को ये 11 अक्टूबर को मिली. इसमें उन्होंने रूजवेल्ट को परमाणु बम विकसित करने की सलाह दी थी. उन्होंने रूजवेल्ट को आगाह किया. बताया कि शायद जर्मनी न्यूक्लियर बम विकसित कर रहा है. दिलचस्प तो ये भी है कि आइंस्टाइन खुद भी जर्मनी के ही थे. सोचने की बात है. इतना अमनपसंद इंसान न्यूक्लियर बम बनाने की सलाह दे रहा था!

दूर से ही सही, लेकिन परमाणु बम से हुई बर्बादी के साथ आइंस्टाइन का नाम भी हमेशा-हमेशा के लिए जुड़ गया. उन्हें जिंदगी भर इसका अफसोस रहा. जब अमेरिका ने नागासाकी और हिरोशिमा पर न्यूक्लियर बम गिराया, तो आइंस्टाइन बहुत दुखी हुए थे. उन्होंने एक लेख भी लिखा था.आइंस्टाइन की वो चिट्ठी, जिससे शुरू हुआ विनाशकारी सफर कभी खत्म नहीं हुआ. इस चिट्ठी ने दुनिया में ऐसी न्यूक्लियर दौड़ शुरू की, जो चाहे तो सब हमेशा-हमेशा के लिए बर्बाद कर दे. इसके बाद ही अमेरिका ने प्रॉजेक्ट मैनहटन शुरू किया. 6 अगस्त, 1945 को हिरोशिमा पर जो ऐटम बम गिरा, उसका कोड नाम \'लिटिल बॉय\'था. 9 अगस्त, 1945 को नागासाकी पर \'फैट मैन\' गिराया गया. इन दोनों बमों का सफर आइंस्टाइन के हाथों लिखी चिट्ठी के साथ ही शुरू हुआ था. पढ़िए, आइंस्टाइन की उस चिट्ठी का हिंदी तर्जुमा.

अल्बर्ट आइंस्टाइन
ओल्ड ग्रोव रोड
नासू पॉइंट
पेकोनिक, लॉन्ग आइलैंड
2 अगस्त, 1939

सर,
ई फेरमी और एल सेजलार्ड के कुछ हालिया कामों से मुझे लगने लगा है कि जल्द ही यूरेनियम एक नए और बेहद अहम ऊर्जा स्रोत के तौर पर इस्तेमाल में लाया जाने लगेगा. इस घटनाक्रम की कुछ बातों पर नजर रखे जाने की जरूरत है. अगर जरूरत पड़े, तो इसे लेकर प्रशासनिक स्तर पर तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए. इन्हीं बातों को मद्देनजर रखते हुए कुछ बातों और तथ्यों को आपके ध्यानार्थ पेश करना मुझे अपना फर्ज लग रहा है.

पिछले चार महीनों के दौरान कुछ अहम चीजें हुई हैं. फ्रांस में जोलियट और अमेरिका में फेरमी और सेजलार्ड ने कुछ ऐसी चीजें की हैं, जिससे कुछ नई संभावनाएं पैदा हुई हैं. ऐसा लग रहा है कि बहुत बड़ी मात्रा में यूरेनियम के अंदर न्यूक्लियर चेन रिऐक्शन पैदा करना मुमकिन हो सकता है. इसके द्वारा बहुत बड़ी मात्रा में बिजली पैदा हो सकती है. साथ ही, इस प्रक्रिया से बहुत बड़ी मात्रा में रेडियम जैसे रेडियोऐक्टिव पदार्थ भी निकलेंगे. अब तो ऐसा लग रहा है कि आने वाले भविष्य में, बहुत जल्द ही, ऐसा करना मुमकिन हो जाएगा.

इस नई खोज के कारण बमों का बनना भी संभव हो सकेगा. हालांकि इसके बारे में अभी पुख्ता तौर पर तो नहीं कहा जा सकता है, लेकिन फिर भी ऐसा लग रहा है कि इस नई प्रक्रिया के कारण एक अलग तरह का बेहद शक्तिशाली बम बनाया जा सकेगा. इस तरह का एक इकलौता बम, जिसे नाव पर लादकर बंदरगाह ले जाया जाए और वहां फोड़ दिया जाए, तो पूरे बंदरगाह को ही तबाह कर देगा. इतना ही नहीं, इसका असर आस-पास के इलाकों को भी नष्ट कर देगा. इस तरह के बम बेहद वजनदार होंगे और इन्हें हवाई जहाज या विमानों के माध्यम से एक जगह से दूसरी जगह ले जाना बहुत मुश्किल साबित होगा.

अमेरिका के पास जो कच्चा यूरेनियम (अयस्क) है, वो बहुत खराब गुणवत्ता वाला है. इसकी मात्रा भी बहुत ज्यादा नहीं है. कनाडा और पूर्व चेकोस्लोवाकिया के पास बहुत अच्छी गुणवत्ता का यूरेनियम अयस्क मौजूद है. हालांकि कच्चे यूरेनियम का सबसे अहम स्रोत बेल्जियम कॉन्गो है.

इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए आपको शायद ये बेहतर लगेगा कि अमेरिका के अंदर न्यूक्लियर चेन रिऐक्शन पर काम कर रहे वैज्ञानिकों और प्रशासन/सरकार के बीच एक किस्म का स्थायी संपर्क विकसित किया जाए. ऐसा करने का एक संभावित तरीका ये भी हो सकता है कि आप उन वैज्ञानिकों से संपर्क कायम करने की जिम्मेदारी अपने किसी भरोसेमंद इंसान को सौंप दें. ऐसा कोई शख्स जो अनाधिकारिक तौर पर ये जिम्मेदारी निभा सके. उसके ऊपर ये जिम्मेदारियां होंगी:

1. सरकारी महकमों से संपर्क कायम करना. उन्हें नई गतिविधियों और घटनाक्रमों के बारे में सूचित करना. सरकार क्या कार्रवाई करे, क्या कदम उठाए, इस बारे में सलाह देना. अनुशंसा देना. खासतौर पर ये सुनिश्चित करना कि अमेरिका को यूरेनियम की लगातार और अबाध आपूर्ति मिले.

2. इस संबंध में जो प्रयोग हो रहे हैं, उन्हें गति देना. उनकी रफ्तार बढ़ाना. फिलहाल ये प्रयोग विश्वविद्यालयों की प्रयोगशालाओं के अंदर सीमित हैं. इन प्रयोगों को फंड मुहैया कराना. अपने संपर्क के ऐसे लोगों से फंड का इंतजाम करना, जो कि इस काम के लिए फंडिंग करने को तैयार हों. बड़ी कारोबारी और व्यावसायिक प्रयोगशालाओं, जहां सभी जरूरी चीजें और उपकरण मौजूद हों, उनका सहयोग हासिल करने की भी कोशिश की जानी चाहिए.

मैं जानता हूं कि जर्मनी ने चेकोस्लोवाकिया की खदानों से निकलने वाले यूरेनियम को बेचना बंद कर दिया है. फिलहाल उन खदानों पर जर्मनी का ही कब्जा है. उसने इतनी जल्दी ये फैसला क्यों लिया, इसे शायद इस तरीके से समझा जा सके. जर्मन अंडर-सेक्रेटरी ऑफ स्टेट का बेटा बर्लिन स्थित उस कैसर-विल्हेम इंस्टिट्यूट के साथ जुड़ा हुआ है, जहां अमेरिका द्वारा यूरेनियम पर किए गए कुछ प्रयोगों और कामों को दोहराया जा रहा है.

आपका
अल्बर्ट आइंस्टाइन


अमेरिका ने जापान पर जब बम गिराया, तब तक जर्मनी हथियार डाल चुका था. हिटलर के नेतृत्व में जिस नाजी ऐटमिक बम की आशंका के मद्देनजर आइंस्टाइन ने रूजवेल्ट को चिट्ठी लिखी थी, वो टल चुका था. हिरोशिमा और नागासाकी पर हमले के एक साल तक आइंस्टाइन चुप रहे. उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कोई टिप्पणी नहीं की. न्यू यॉर्क टाइम्स के पहले पेज पर एक छोटा सा लेख था. उसमें एक छोटी सी पंक्ति में आइंस्टाइन की प्रतिक्रिया थी. इसमें जो लिखा था, वो आइंस्टाइन की हताशा के शब्द थे. लेख का शीर्षक था- आइंस्टाइन डिप्लोर्स यूज ऑफ ऐटम बम. तारीख थी, 19 अगस्त 1946. अखबार ने लिखा था:

प्रफेसर अल्बर्ट आइंस्टाइन ने कहा कि अगर राष्ट्रपति रूजवेल्ट जिंदा होते, तो जापान पर परमाणु हमला नहीं होने देते. जापान पर हमला इसलिए किया गया, ताकि रूस के शामिल होने से पहले ही प्रशांत महासागर के मोर्चे पर चल रही लड़ाई खत्म की जा सके.

आइंस्टाइन ने बाद में लिखा:

जापान के खिलाफ परमाणु बम के इस्तेमाल की मैंने हमेशा ही निंदा की. ये गलत था. बहुत गलत.
आइंस्टाइन को अपनी लिखी इस चिट्ठी पर तमाम उम्र मलाल रहा. ऐटम बम के निर्माण में अपनी भूमिका पर उन्हें बहुत तकलीफ थी. नवंबर 1954 में अपनी मौत (18 अप्रैल, 1955) के 5 महीने पहले उन्होंने लिखा:

*मैंने अपनी जिंदगी में ये एक बड़ी गलती की है. जब मैंने राष्ट्रपति रूजवेल्ट को भेजी जाने वाली उस चिट्ठी, जिसमें कि ऐटम बम बनाए जाने की अनुशंसा की गई थी, पर दस्तखत किया, तो वो मेरी गलती थी. उस समय उसके पीछे एक तर्क था. जर्मनी के हाथों परमाणु हथियार विकसित किए जाने का खतरा*

BACK TO TOP