Message # 425174

जब कभी निराश होने लगता हूँ,
तो न जाने मुझे संभालता कौन है ...
मेरा राम ही है मेरी चोटें ठीक करने को,
वर्ना किसी के लिए कोई मलहम तलाशता कौन है ...

झोपड़ियों का *दीपक* हूँ मैं,
जो जल उठा हूँ बड़े महलों में भी ...
वर्ना मेरे सी छोटी हैसियत वालों को,
परमात्मा के सिवा इतना तराशता कौन है ...

खुद तृप्त होकर धरती भी,
भर लेती है अपने घड़े और तालाब बारिश में ...
सूखे बादलों में इतना पानी,
परमपिता के सिवा और डालता कौन है ...

रात को सो जाता हूँ माँ की गोद सा निश्चिंत,
नींद भुला देती है सारी व्यथाएँ कुछ घंटों के लिए ...
दिन भर की जानलेवा थकान,
उस पालनहार के सिवा उतारता कौन है॥

 
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Heart catcher
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