Message # 417669

मेरी हथेलियों में एक दूसरे को काटती हुई,
बहुत उलझी हुई सी लकीरें हैं ...
मेहनतकशों की शायद इस दुनियाँ में,
मेरे जैसी सी ही तकदीरें हैं ...

जमीन पे भी नहीं हैं,
जो खुद को आसमान का हकदार कहते थे ...
यहाँ एक-दो नहीं,
हजारों-लाखों ऐसी नजीरें हैं ...

जोर तो मैने भी पूरा लगाया,
मगर मंजिल ख्वाब ही रही मेरे लिए ...
हाथों में हथकड़ी है अपनों की,
और मेरे पाँव में वक्त की जंजीरें हैं ...

किसी भी बंदे को,
थोड़ा सा कुरेदता हूँ तो यूँ लगता है ...
कि परत दर परत सबमें,
एक से बढ़कर एक दर्द और पीड़ें हैं ...

केवल तस्वीरों/सेल्फियों में कैद हैं,
मुस्कुराते/खिलखिलाते हुए चेहरे ...
पर यूँ सच में देखो तो,
इन्सान यहाँ दुःख की जीती-जागती तस्वीरें हैं॥

 
140
 
241 days
 
Heart catcher
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