Message # 417667

हंगामा-ए-ग़म से तंग आ कर,
इज़हार-ए-मोहब्बत कर बैठे ...
मशहूर थी अपनी ज़िंदा-दिली,
बेमतलब खुद से शरारत कर बैठे ...

कोशिश तो बहुत की हम ने,
मगर पाया न ग़म-ए-हस्ती का इलाज़ ...
वीरानी-ए-दिल जब हद से बढ़ी,
तो हम एक हसीना से मोहब्बत कर बैठे ...

दुनियाँ-ए-जहाँ से नफ़रत करके,
हमारा हस़रते-ए-वाइज़ क्या कहना ...
भगवान के आगे बस न चला,
तो दुनियाँ वालों से बग़ावत कर बैठे ...

उजाड़ने ने तो कोशिश कर डाली,
कि सूनी हो जाए चमन की हर डाली ...
पर सूखे काँटों ने मुबारक काम किया,
वो अंजामे में फूलों की हिफ़ाज़त कर बैठे ...

राम तो सब की सुनता है,
जल्दबाजी है हमें ही अपनी-अपनी ...
हम ने ज़बाँ से उफ़ भी न की,
पर हमारे हालात शिकायत कर बैठे॥

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