Message # 417516

!! भय कैसा !!
मैंने सुना है, एक युवक,
एक राजपूत युवक विवाह करके लौट रहा है।
नाव में बैठा है, जोर का तूफान उठा है।
उसकी नववधू कंपने लगी, घबड़ाने लगी;
लेकिन वह निश्चिंत बैठा है।
उसकी पत्नी ने कहा: आप निश्चिंत बैठे हैं!
तूफान भयंकर है,
नाव अब डूबी तब डूबी हो रही है,
आप भयभीत नहीं हैं?
उस राजपूत युवक ने म्यान से तलवार निकाली——
चमचमाती नंगी तलवार——
अपनी पत्नी के गले के पास लाया,
ठीक गले में छूने लगी तलवार;
और पत्नी हंसने लगी।
उस राजपूत ने कहा: तू डरती नहीं!
तलवार तेरी गर्दन के इतने करीब है,
जरा—सा इशारा कि गर्दन अलग हो जाए,
तू डरती नहीं है?
उसने कहा: जब तलवार तुम्हारे हाथ में है,
तो भय कैसा! जहां प्रेम है, वहां भय कैसा!
उस युवक ने कहा कि
यह तूफान भी परमात्मा के हाथ में है।
यह तलवार बिलकुल गर्दन के करीब है,
लेकिन परमात्मा के हाथ में है, तो भय कैसा?
जो होगा, ठीक ही होगा।
अगर गर्दन कटने में ही हमारा लाभ होगा,
तो ही गर्दन कटेगी;
तो हम धन्यवाद देते ही मरेंगे।
अगर यह तूफान हमें डुबाता है,
तो उबारने के लिए ही डुबाएगा।
उसके हाथ में तूफान है, भय कैसा?
मेरे हाथ में तलवार है, तू भयभीत नहीं;
यह तलवार किसी और के हाथ में होती,
तू भयभीत होती।
तेरा परमात्मा से प्रेम का नाता नहीं है,
इसलिए भयभीत हो रही है।
तूफान के कारण भयभीत नहीं हो रही है,
परमात्मा से प्रेम नहीं है
इसलिए भयभीत हो रही है।
ख्याल रखना, जब भी तुम भयभीत होते हो,
तो असली कारण सिर्फ एक ही होता है:
परमात्मा से प्रेम नहीं है।
जिसका परमात्मा से प्रेम है,
उसके लिए सारे भय विसर्जित हो जाते हैं।
🙏🙏🙏🙏

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